प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में, “हम सभी भारतीय भाषाओं को भारतीयता की आत्मा और देश के बेहतर भविष्य का संबंध मानते हैं.”
यह वाक्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के परिवर्तनकारी दृष्टिकोण का प्रतीक है. NEP 2020 का मुख्य उद्देश्य मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता देना है, जो संघीय ढांचे को सुदृढ़ करने में मदद करता है. कुछ राजनैतिक लाभ के लिए हिंदी थोपने या हिंदी के बारे में गलत प्रचारित करना संघीय एकता को नुकसान पहुँचाने का काम करता है.
तीन-भाषा नीति की नई दिशा
NEP 2020, 1968 और 1986 की शिक्षा नीतियों की तरह तीन-भाषा नीति को अनुसरण करती है, लेकिन यहां बड़ा बदलाव है. 1968 और 1986 की कांग्रेस सरकार की नीतियों में, गैर-हिंदी भाषी राज्यों के छात्रों को हिंदी तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाती थी, जबकि NEP 2020 के तहत छात्रों को अपनी पसंद की किसी भी क्षेत्रीय भाषा को चुनने का अधिकार दिया गया है. यह परिवर्तन भारतीय शिक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जिसका उद्देश्य राष्ट्र की भाषाई विविधता को बढ़ावा देना है.
किसी भी भाषा को थोपने का सवाल नहीं
NEP 2020 में हिंदी का केवल एक बार उल्लेख किया गया है, जबकि क्षेत्रीय भाषाओं जैसे तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और उड़िया का उल्लेख कई बार किया गया है. यह दर्शाता है कि नीति क्षेत्रीय भाषाओं को समान महत्व देने की दिशा में अग्रसर है.
1968 में DMK सरकार ने तीन-भाषा नीति का विरोध किया था, और तब से तमिलनाडु में दो-भाषा नीति अपनाई गई है. हालाँकि, आज तमिलनाडु में निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या सरकारी स्कूलों से अधिक है. अगर यह नीति राज्य सरकार के लिए हानिकारक है, तो क्या यह नहीं दिखाता कि कई निजी स्कूल तीन-भाषा नीति का पालन कर रहे हैं? यह सवाल विचारणीय है.
NEP 2020 का उद्देश्य भारतीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन करना है, न कि हिंदी को थोपना. इस नीति का उद्देश्य भाषा की विविधता को बढ़ावा देना है, जो पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधने का काम करेगा.
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