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पहलगाम आतंकी हमले में पिता को खोया, सरकार ने किया था नौकरी का वादा, लेकिन अब तक नहीं हुआ पूरा, भटक रहीं असावरी जगदाले

पिछले साल पहलगाम घाटी में हुए आतंकवादी हमले में असावरी जगदाले के पिता संतोष जगदाले शहीद हो गए. सरकार ने मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया था, लेकिन नौकरी अब तक फाइलों में अटकी हुई है.

शहीद संतोष जगदाले की बेटी असावरी जगदाले

पहलगाम आतंकी हमले को बीते 10 महीने हो चुके हैं, लेकिन महाराष्ट्र के एक शहीद परिवार के लिए जख्म आज भी हरे हैं. यह कहानी है असावरी जगदाले की, जिनके पिता संतोष जगदाले ने उस खौफनाक हमले में अपनी जान गंवाई थी. आज असावरी सिस्टम की फाइलों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं.

पिछले साल 22 अप्रैल को जब आतंकियों ने पहलगाम घाटी में अंधाधुंध फायरिंग कर 26 बेगुनाहों की जान ले ली थी. इस हमले में महाराष्ट्र के 6 लोग शहीद हुए थे, जिनमें संतोष जगदाले भी शामिल थे. हादसे के फौरन बाद, जैसा कि अक्सर होता है, सरकार ने पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और सरकारी नौकरी का ऐलान किया. 50 लाख रुपये की मदद तो मिली, लेकिन परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा आज भी फाइलों में कहीं दबा हुआ है.

असावरी जगदाले का दर्द उनकी बातों में साफ झलकता है. उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बताया कि पिता के जाने के बाद घर की जमा-पूंजी धीरे-धीरे खत्म हो रही है. आज परिवार आर्थिक तंगी के मुहाने पर खड़ा है. असावरी कहती हैं, “जब भी हम मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री कार्यालय में संपर्क करते हैं, तो बस एक ही जवाब मिलता है कि फॉलो-अप जारी है. पर यह फॉलो-अप कब खत्म होगा, किसी को नहीं पता है.

सियासत और सिस्टम के बीच फंसा परिवार

अब इस मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया है. राज्यसभा सांसद मेधा कुलकर्णी ने सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर इस मामले में दखल देने की मांग की है. वहीं, मामले के गरमाने के बाद महाराष्ट्र बीजेपी भी हरकत में आई है. बीजेपी के मीडिया प्रभारी नवनाथ बान ने भरोसा दिलाया है कि वह व्यक्तिगत रूप से इस मुद्दे को मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के सामने रखेंगे.

उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को एक संवेदनशील नेता बताते हुए कहा कि पार्टी का स्टैंड पूरी तरह से जगदाले परिवार के साथ है. लेकिन सवाल वही है कि आखिर एक शहीद की बेटी को अपना हक मांगने के लिए मीडिया और नेताओं का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ रहा है.

क्या संवेदनशीलता दिखाएगी सरकार?

यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि उस सिस्टम पर भी सवाल है जो शहीद का दर्जा तो दे देता है, लेकिन उनके पीछे छूटे परिवारों को भटकने के लिए छोड़ देता है. असावरी की मांग सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि उस सम्मान और सुरक्षा की बहाली है जिसका वादा उनके पिता की शहादत के वक्त किया गया था.

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-भारत एक्सप्रेस



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