PM Modi Sanskrit Shlok mean: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पहले ट्विटर) पर लगातार संस्कृत के अनमोल सुभाषितों (श्लोकों) को साझा कर देश और दुनिया को एक नई राह दिखा रहे हैं. मंगलवार, 19 मई को पीएम ने अथर्ववेद का एक बेहद शक्तिशाली श्लोक साझा किया, जिसमें ‘धरती माता’ को पूरी मानवता का साझा घर बताया गया है.
राजनीतिक गलियारों में पीएम के इस कदम को वैश्विक स्तर पर भारत की ‘सांस्कृतिक कूटनीति’ (Cultural Diplomacy) के रूप में देखा जा रहा है, जो यह संदेश देता है कि भारत आज भी हर संस्कृति और विचारधारा का सम्मान करने वाली ‘विश्व गुरु’ की सोच रखता है.
धरती माता पूरी मानवता को एक परिवार मानती हैं। उनके लिए यह पूरा संसार एक घर की तरह है, जहां हर संस्कृति का अपना महत्त्व और सम्मान है।
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्।
सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती ॥ pic.twitter.com/slfA4fI6rw
— Narendra Modi (@narendramodi) May 19, 2026
‘जनं बिभ्रती बहुधा…’: विविधता में एकता का वैश्विक मंत्र
प्रधानमंत्री ने जो श्लोक साझा किया, वह है कि ‘जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्. सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती ॥’
इसका सरल हिंदी अर्थ यह है कि विभिन्न भाषाएं बोलने वाले और अलग-अलग धर्मों-परंपराओं को मानने वाले लोगों को यह धरती माता एक ही घर के सदस्यों की तरह पालती है. यह पृथ्वी हमारे लिए समृद्धि की हजारों धाराएं उसी तरह बहाए, जैसे कोई शांत और प्रेमपूर्ण गाय दूध देती है. पीएम का यह पोस्ट ऐसे समय में आया है जब दुनिया युद्ध और वैचारिक मतभेदों से जूझ रही है, और भारत पूरी दुनिया को एक परिवार (One Earth, One Family) का संदेश दे रहा है.
‘जलबिन्दुनिपातेन…’: लगातार प्रयास से ही बनेगा ‘विकसित भारत’
इससे ठीक एक दिन पहले यानी सोमवार को भी पीएम मोदी ने एक बेहद व्यावहारिक श्लोक साझा किया कि ‘जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः. सः हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च..’
इसका अर्थ है कि जिस प्रकार पानी की एक-एक बूंद गिरने से घड़ा भर जाता है, ठीक उसी प्रकार निरंतर छोटे-छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है. जानकारों का मानना है कि इस श्लोक के जरिए पीएम ने देशवासियों को संदेश दिया है कि ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य रातों-रात पूरा नहीं होगा बल्कि हर नागरिक के रोज के छोटे-छोटे योगदान और प्रयास से ही देश महाशक्ति बनेगा.
‘यथाशक्ति चिकीर्षन्ति…’: आत्मनिर्भर भारत और ज्ञानियों का लक्षण
पीएम मोदी ने 15 मई को विदुर नीति का एक श्लोक साझा कर भारतीय समाज की ताकत को रेखांकित किया कि ‘यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते. न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥’
इसका अर्थ है कि बुद्धिमान व्यक्ति अपने विवेक और सामर्थ्य पर पूर्ण विश्वास रखते हुए ही किसी कार्य का निश्चय करते हैं और दूसरों को हीन दृष्टि से नहीं देखते. पीएम ने इसके साथ लिखा था कि देशवासियों के इसी ‘आत्मविश्वास और सामर्थ्य’ के दम पर आज भारत वैश्विक पटल पर नए रिकॉर्ड बना रहा है. यह श्लोक सीधे तौर पर भारत के ‘आत्मनिर्भर’ होने की कहानी बयां करता है.
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सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड हो रहा?
प्रधानमंत्री मोदी की यह ‘सुभाषित सीरीज’ युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है. अक्सर तकनीकी और आधुनिकता की अंधी दौड़ में पीछे छूट रही हमारी प्राचीन विरासत को पीएम एक नए और आकर्षक अंदाज में री-ब्रांड कर रहे हैं. इन श्लोकों के माध्यम से वे जनता को सीधे संदेश दे रहे हैं कि ज्ञान, धैर्य और वैश्विक भाईचारा ही भारत की असली पहचान हैं. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत की इस समृद्ध विरासत की गूंज सुनाई दे रही है.
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-भारत एक्सप्रेस
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