प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया. इस श्लोक के जरिए उन्होंने उन वीर साधकों के त्याग और समर्पण को रेखांकित किया, जिन्होंने अपने निजी सुख और स्वार्थ से ऊपर उठकर स्वराज्य और राष्ट्र की सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया.
पीएम मोदी ने अपने संदेश के साथ संस्कृत का यह श्लोक पोस्ट किया,
“भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः.
स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥”
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः।
स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥ https://t.co/l8p6WVHaHk
— Narendra Modi (@narendramodi) October 8, 2026
इस सुभाषित का सीधा भाव यह है कि जो लोग अपने निजी सुख-सुविधाओं और स्वार्थ का त्याग कर पूरी तरह स्वराज्य की साधना में जुट जाते हैं, वे वास्तव में धन्य हैं. ऐसे लोगों का जीवन केवल अपने लिए नहीं होता, बल्कि उनके त्याग का उद्देश्य समाज और राष्ट्र के व्यापक हित से जुड़ा होता है.
निजी सुख छोड़कर राष्ट्र को समर्पित जीवन
श्लोक में खास तौर पर ऐसे लोगों का उल्लेख किया गया है, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों और सुख-सुविधाओं को पूरी तरह पीछे छोड़ दिया. यहां त्याग को केवल एक विचार के तौर पर नहीं, बल्कि जीवन जीने के तरीके के रूप में सामने रखा गया है.
सुभाषित में कहा गया है कि इन वीर साधकों ने अपने स्वार्थ और सुख को मानो भस्म कर दिया और अपने पूरे अस्तित्व को स्वराज्य की साधना में लगा दिया. यानी उनके लिए व्यक्तिगत आराम या लाभ से ज्यादा महत्वपूर्ण देश और समाज का हित था.
‘वीर योगी’ पर खास जोर
इस संदेश की एक खास बात यह है कि इसमें सामान्य योगी की नहीं, बल्कि ‘वीर योगी’ की बात की गई है. यहां ‘वीर योगी’ से आशय ऐसे देशभक्तों से है, जिन्होंने राष्ट्र के लिए संघर्ष करते हुए निजी जीवन की चिंताओं और सुविधाओं को पीछे छोड़ दिया.
श्लोक का संदेश यही है कि देश के लिए त्याग और समर्पण करने वाले ऐसे लोगों का योगदान हमेशा सम्मान के योग्य है. उन्होंने अपने जीवन को किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय स्वराज्य और राष्ट्र की सेवा के लिए समर्पित किया.
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-भारत एक्सप्रेस
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