फोटो क्रेडिट-AI@chatgpt
बलात्कार और मर्डर केस में 20 साल की सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर 21 दिन की ‘छुट्टी’ यानी फरलो (Ram Rahim Parole Furlough) मिल गई है. ज्ञात रहे साल 2020 के बाद से यह 17वां मौका है जब बाबा के लिए जेल का फाटक खुला है. जिसके बाद से आम जनता के मन में सिर्फ एक ही सवाल कौंध रहा है कि आखिर कानून की किताबों में ऐसा कौन सा ‘जादुई लूपहोल’ लिखा है, जिसके सहारे एक मुजरिम हर दो-तीन महीने में जेल से बाहर-भीतर होता रहता है?
इसके लिए आपको बता दें कि सारा खेल छिपा है जेल मैनुअल के दो शब्दों में ‘पैरोल’ और ‘फरलो’. आइए आसान और सरल भाषा में समझते हैं जेल के कैदियों को दी जाने वाली इस कानूनी राहत के पूरे गणित को…
क्या होती है ‘पैरोल’?(kya hoti hai Parole)
साधारण भाषा में समझें तो पैरोल किसी कैदी को मिली वो अस्थायी रिहाई है, जो किसी ‘एमरजेंसी’ या खास वजह से दी जाती है. जैसे-घर में किसी की अचानक मौत हो जाना, परिवार में कोई गंभीर बीमार पड़ जाना या फिर बच्चे की शादी. हरियाणा के नियमों के मुताबिक, कैदी को तय शर्तों के साथ कुछ दिनों के लिए बाहर भेजा जाता है. लेकिन पेंच यह है कि पैरोल पर बाहर बिताया गया एक-एक दिन कैदी की मूल सजा में नहीं जुड़ता; यानी उतने दिन उसे बाद में जेल में एक्स्ट्रा काटने पड़ते हैं.
फिर क्या है ये ‘फरलो’?
अब आते हैं असली खेल पर यानी ‘फरलो’ पर..एक लाइन में बताएं तो आप इसे कैदी की ‘पेड लीव’ यानी सरकारी छुट्टी के तौर पर समझ सकते हैं. कायदे से जो कैदी लंबे समय से जेल में बंद हैं और जिनका जेल में व्यवहार ‘अच्छा’ दर्ज है, उन्हें समाज और परिवार से कटे न रहने के लिए बिना किसी खास वजह के भी फरलो दी जाती है.
वहीं सबसे मजेदार बात यह है कि फरलो पर जेल से बाहर बिताए गए दिन सजा की अवधि में गिने जाते हैं! यानी राम रहीम बाहर आश्रम में रहे या घूमता रहे, उसकी 20 साल की सजा का कांटा जेल के अंदर अपने आप कम होता रहता है.
राम रहीम ने कैसे खोजा सिस्टम का लूपहोल?(Ram Rahim Parole Furlough)
अक्टूबर 2020 से लेकर अगस्त 2026 तक राम रहीम कुल 17 बार पैरोल और फरलो का फायदा उठा चुका है. कभी 21 दिन, कभी 30 दिन तो कभी सीधे 50 दिन का ब्रेक! जेल कानून का लूपहोल यह है कि एक साल में कैदी के लिए पैरोल और फरलो के अलग-अलग कोटा तय होते हैं. जैसे ही पैरोल का कोटा खत्म होता है, बाबा के वकील फरलो की अर्जी चिपका देते हैं. जैसे ही फरलो खत्म होती है, अगले कैलेंडर ईयर की पैरोल तैयार मिलती है! इसी कानूनी तालमेल के दम पर बाबा साल में कई-कई महीने बाहर बिता लेता है.
‘चुनाव आएं और बाबा बाहर न आएं?’ टाइमिंग पर भी सवाल
राम रहीम की इन लगातार रिहाइयों पर सबसे बड़ा बवाल इसकी ‘क्रोनोलॉजी’ और टाइमिंग को लेकर मचता है. 2024 और 2025 में जब-जब हरियाणा या पड़ोसी राज्यों में चुनाव के बिगुल बजे, ठीक उसी वक्त बाबा की पैरोल मंजूर हो गई. ज्ञात रहे हरियाणा और पंजाब में डेरा सच्चा सौदा का तगड़ा वोट बैंक है. विपक्ष और सामाजिक संगठन यही आरोप लगाते आए हैं कि ‘सक्षम प्राधिकारी’ और सरकारें कानून की आड़ लेकर वोटों की मलाई चाटने के लिए बाबा को बार-बार ‘अस्थायी आजादी’ की खैरात बांटती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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