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‘सत्य निकेतन तो झांकी, असली हादसा बाकी?’ साउथ दिल्ली के ‘मोची विलेज’ की संकरी गलियों की खौफनाक हकीकत

सत्य निकेतन हादसे के बाद सामने आए मोची विलेज के वीडियो ने दिल्ली की पुरानी और घनी बस्तियों में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आईए जानते हैं मामले को विस्तार से…

Delhi News

साउथ दिल्ली की बेहद संकरी गली में खड़ी जर्जर बहुमंजिला इमारतें, PC-@arjundeodia

Building Safety Delhi News: मॉल, चौड़ी सड़कें और आलीशान लाइफस्टाइल के लिए जानी जाने वाली ‘ब्यूटीफुल साउथ दिल्ली’ की चकाचौंध के पीछे एक बेहद खौफनाक, बदसूरत और जानलेवा हकीकत छिपी है. दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के साउथ कैंपस के पास स्थित सत्य निकेतन का ‘मोची विलेज’ इसका सबसे बड़ा जीता-जागता उदाहरण है. हालांकि 6 सितंबर को सत्य निकेतन में हुए दर्दनाक पीजी इमारत पतन ने उस काले सच को बेपर्दा कर दिया है, जिसे अब तक लीपापोती करके छिपाया जाता रहा था.

इसी मामले की और गहराई से पोल खोलते हुए इंटरनेट पर @arjundeodia नाम के हैन्डल द्वारा एक वीडियो साझा किया गया है. वीडियो में दिखाई दे रही सत्य निकेतन के पास के इलाके की बेहद संकरी, अंधेरी और घनी गलियों को देखकर हर किसी के जेहन में यही सवाल उठ रहा है कि क्या सत्य निकेतन का हादसा तो सिर्फ एक छोटी सी झांकी है, और कोई इससे भी बड़ा महा-हादसा होना अभी बाकी है?

 

क्या था 6 सितंबर का ‘सत्य निकेतन हादसा’?(Satya Niketan Building Collapse)

ज्ञात रहे 6 सितंबर को दोपहर करीब 1:30 बजे सत्य निकेतन स्थित ‘हॉस्टल डेज’ नाम की लगभग 50 साल पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक ताश के पत्तों की तरह ढह गई थी. उस वक्त इमारत के बेसमेंट में बेहद लापरवाही से खुदाई और मरम्मत का काम चल रहा था. इस भयानक हादसे में 12 लोगों को मलबे से निकाला गया, जिनमें से 7 मासूम छात्रों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि कई छात्र अब भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं.

जांच में खुलासा हुआ कि यह इमारत मूल रूप से केवल ग्राउंड प्लस वन (G+1) के लिए पास थी, लेकिन लालच में आकर इस पर अवैध रूप से कई अतिरिक्त मंजिलें तान दी गईं. पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इमारत के मालिक हरिराम गुप्ता, उनकी पत्नी उर्मिला और बेटे महेश को गिरफ्तार कर लिया है.

एंबुलेंस और फायर टेंडर का पहुंचना भी ‘नामुमकिन’

हादसे के बाद सामने आए वीडियो में साफ दिख रहा है कि सत्य निकेतन और उससे लगे मोची विलेज का शहरी ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है. मूल पुनर्वास कॉलोनी (Rehabilitation Colony) की इन संकरी गलियों में हवा और रोशनी का नामोनिशान नहीं है.

सबसे खौफनाक बात यह है कि गलियां इतनी संकरी हैं कि किसी भी आपातकालीन स्थिति में फायर ब्रिगेड की गाड़ियां, एंबुलेंस या राहत-बचाव के लिए जेसीबी (JCB) जैसी भारी मशीनें यहां तक पहुंच ही नहीं सकतीं. यानी अगर किसी इमारत में आग लग जाए या कोई दूसरा ढांचा गिर जाए, तो अंदर फंसे छात्रों को सुरक्षित बाहर निकालना केवल भगवान भरोसे ही रहेगा.

50 साल पुरानी इमारतों पर खड़ी की जा रहीं बहुमंजिला इमारतें

विशेषज्ञों और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली में पीजी (PG) आवासों को विनियमित या कंट्रोल करने वाला कोई समर्पित और सख्त कानून ही नहीं है. दिल्ली यूनिवर्सिटी के हजारों छात्र हर साल यहां पढ़ाई करने आते हैं. छात्र आवास की इसी भारी मांग का फायदा उठाकर मकान मालिक नियमों और सुरक्षा मानकों को पूरी तरह ताक पर रख देते हैं.

दशकों पुरानी, कमजोर नींव वाली इमारतों पर बिना किसी स्ट्रक्चरल ऑडिट के अतिरिक्त मंजिलें खड़ी कर दी जाती हैं और बेसमेंट में अनधिकृत खुदाई की जाती है. पुरानी संरचनाओं पर यह अतिरिक्त भार कभी भी बड़े कत्लेआम की वजह बन सकता है.

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‘हाइप्ड’ साउथ दिल्ली से छंट रहा भ्रम का पर्दा

‘सौंदर्यपूर्ण साउथ दिल्ली’ की जो हाइप्ड और रंगीन छवि सोशल मीडिया पर बेची जाती है, सत्य निकेतन और मोची विलेज की ये तस्वीरें उस पर करारा तमाचा हैं. इस हादसे के बाद से आसपास के पीजी में रहने वाले छात्रों और उनके परिजनों के बीच गहरा खौफ का माहौल है. सुरक्षा की गंभीर कमियों और संभावित खतरों को देखते हुए अब बड़ी संख्या में छात्र विकल्प के तौर पर दूसरे सुरक्षित इलाकों में कमरों की तलाश कर रहे हैं.

वहीं प्रशासन अगर अब भी नहीं चेता और इन जानलेवा अवैध निर्माणों पर बुलडोजर नहीं चला, तो आने वाले दिनों में किसी और बड़े हादसे को टालना मुमकिन नहीं होगा.

-भारत एक्सप्रेस

 



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