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उद्धव ठाकरे की पार्टी अलर्ट मोड में, बागी सांसदों के खिलाफ संवैधानिक दांव; लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को लिखा पत्र

Shiv Sena UBT Crisis: शिवसेना (UBT) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर बागी सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता देने या किसी अन्य दल में विलय की संभावनाओं पर आपत्ति जताई है.

Shiv Sena UBT Crisis

Shiv Sena UBT Crisis: शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर पार्टी के कुछ सांसदों को अलग समूह के रूप में मान्यता न देने की मांग की अथवा किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय की संभावनाओं पर गंभीर आपत्ति जताई गई है. यह पत्र पार्टी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के निर्देश पर सांसद अरविंद सावंत ने भेजा है.

अलग गुट को मान्यता देने पर जताई आपत्ति

पत्र में कहा गया है कि मीडिया में ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि पार्टी के कुछ सांसद लोकसभा में अलग समूह के रूप में पहचान हासिल करने या किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए प्रयास कर सकते हैं. शिवसेना (यूबीटी) ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे किसी भी दावे पर विचार नहीं किया जाना चाहिए. पार्टी का कहना है कि वह एक ही राजनीतिक दल है और संसदीय दल उसी का हिस्सा होता है. ऐसे में एक ही पार्टी के भीतर अलग-अलग समूहों को अलग पहचान देना संविधान और संसदीय व्यवस्था की भावना के खिलाफ होगा.

सांसद अरविंद सावंत ने पत्र में लिखा, “असली शिवसेना का प्रतिनिधित्व करने का हमारा दावा सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और यह पत्र उस दावे पर बिना किसी प्रतिकूल प्रभाव डाले लिखा जा रहा है. मीडिया में ऐसी खबरें आ रही हैं कि शिवसेना (UBT) के चुनाव चिह्न पर चुने गए कुछ सांसद आपके कार्यालय से संपर्क कर रहे हैं या संपर्क करने पर विचार कर रहे हैं, ताकि उन्हें लोकसभा के भीतर एक अलग समूह के रूप में मान्यता मिल सके या वे किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय कर सकें. चूंकि ऐसी खबरें राजनीतिक दलों और विधायी दलों को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक व्यवस्था से सीधे जुड़े मुद्दों को उठाती हैं, इसलिए मैं पार्टी का पक्ष रिकॉर्ड पर रखना और सम्मानपूर्वक यह अनुरोध करना आवश्यक समझता हूं कि ऐसे किसी भी दावे पर विचार न किया जाए.”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

अरविंद सावंत ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव और अन्य का भी उल्लेख किया है. उन्होंने कहा कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक दल के भीतर विभाजन को अब संवैधानिक मान्यता नहीं है. उन्होंने याद दिलाया कि संविधान (91वां संशोधन) अधिनियम, 2003 के तहत दसवीं अनुसूची के पैरा 3 को हटा दिया गया था. इसके बाद किसी भी दल के सदस्य केवल विभाजन का दावा कर अयोग्यता से नहीं बच सकते.


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स्पीकर से की यह मांग

शिवसेना (यूबीटी) ने लोकसभा अध्यक्ष से आग्रह किया है कि सदन में पार्टी को उसके अधिकृत नेता और व्हिप के जरिए ही मान्यता दी जाए. साथ ही, यदि किसी सांसद या समूह की ओर से अलग पहचान या विलय संबंधी कोई अनुरोध आता है, तो उस पर फैसला लेने से पहले पार्टी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए. पार्टी ने यह भी कहा है कि वह संविधान और कानून के तहत उपलब्ध सभी अधिकारों का इस्तेमाल करने का विकल्प सुरक्षित रखती है.

-भारत एक्सप्रेस



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