Ritabrata Bandopadhyay TMC Rebel: पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और बड़ी खबर सामने आ रही है. हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के वजूद पर ही संकट मंडराने लगा है. पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में टीएमसी से सस्पेंड किए गए बागी विधायक ऋतब्रत बंदोपाध्याय और संदीपन साहा भारी लाव-लश्कर और 50 से अधिक विधायकों के समर्थन पत्र के साथ अचानक बंगाल विधानसभा पहुंच गए हैं.
बागी गुट का दावा है कि उनके पास टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से दो-तिहाई (54 से अधिक) का आंकड़ा मौजूद है. सूत्रों के मुताबिक, यह बागी धड़ा अब ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती देते हुए ऋतब्रत बंदोपाध्याय को विधानसभा में ‘नया नेता प्रतिपक्ष’ बनाने की पूरी तैयारी कर चुका है. बंगाल की यह सियासी तस्वीर साल 2022 में महाराष्ट्र के ‘शिवसेना-एकनाथ शिंदे कांड’ की याद दिला रही है.
कौन हैं ऋतब्रत बंदोपाध्याय? (Ritabrata Bandyopadhyay Political Journey)
टीएमसी में इतनी बड़ी सेंधमारी करने वाले ऋतब्रत बनर्जी (ऋतब्रत बंदोपाध्याय) बंगाल की राजनीति के बेहद चतुर और पुराने खिलाड़ी माने जाते हैं. उनके अब तक के सफर पर नजर डालें तो उनके तेवर हमेशा से बागी रहे हैं.
- कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि: ऋतब्रत बंदोपाध्याय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वामपंथी छात्र संगठन SFI से की थी.
- राज्यसभा का सफर: उनकी आक्रामकता को देखते हुए साल 2014 में सीपीएम (CPI-M) ने उन्हें राज्यसभा भेजा था.
- पार्टी से निष्कासन: साल 2017 में सीपीएम ने उन्हें अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी रुख के कारण निष्कासित कर दिया.
- TMC में एंट्री और कद: साल 2020 में वे औपचारिक रूप से ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से जुड़े और जल्द ही उन्हें टीएमसी ट्रेड यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष जैसी भारी-भरकम जिम्मेदारी मिल गई.
- विधायक दल में पैठ: साल 2024 में वे दूसरी बार राज्यसभा पहुंचे और फिर 2026 के विधानसभा चुनाव में उलूबेरिया पूरबा सीट से विधायक बनकर सदन में आए. आज वे ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुके हैं.
बगावत की इनसाइड स्टोरी (Ritabrata Bandopadhyay Rebel Story)
इस तख्तापलट की नींव तब पड़ी जब टीएमसी ने ऋतब्रत और संदीपन साहा को सस्पेंड कर दिया. दोनों बागियों ने आरोप लगाया था कि 6 मई को सदन के नेता प्रतिपक्ष और चीफ व्हिप के नामों को मंजूरी देने वाले टीएमसी के आधिकारिक प्रस्ताव पत्र पर कई विधायकों के फर्जी दस्तखत किए गए थे.
पार्टी से निकाले जाने के बाद ऋतब्रत ने सीधे टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व यानी अभिषेक बनर्जी पर निशाना साधते हुए कहा था कि “पार्टी को ममता बनर्जी के हाथों से हाईजैक (अपहरण) कर लिया गया है.” इसके बाद कोलकाता के विधायक हॉस्टल में गुप्त बैठकों का दौर शुरू हुआ और बुधवार को विधानसभा के नौशाद अली कक्ष में अरूप राय, शिउली साहा, अखरुज्जमा, सबीना यास्मिन और चंद्रनाथ सिंह जैसे दिग्गज विधायकों ने ऋतब्रत बंदोपाध्याय को अपना नया नेता मान लिया.
ममता बनर्जी के सामने कानूनी संकट
विधानसभा चुनाव में महज 80 सीटों पर सिमट चुकी टीएमसी के लिए ऋतब्रत की यह बगावत रीढ़ की हड्डी तोड़ने जैसी है. इसके दो बड़े कानूनी और राजनीतिक परिणाम होने जा रहे हैं. दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए किसी भी पार्टी के दो-तिहाई विधायकों का एक साथ टूटना जरूरी है. टीएमसी के 80 विधायकों के लिहाज से यह जादुई आंकड़ा 54 विधायक होता है. बागियों का दावा 54 से पार (58-59 विधायकों) का है. अगर यह सच साबित होता है, तो बागी गुट बिना सदस्यता गंवाए खुद को ‘असली टीएमसी’ घोषित कर देगा.
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विधानसभा नियमों के मुताबिक सदन में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा बनाए रखने के लिए कम से कम 10% यानी 29 विधायकों का होना अनिवार्य है. यदि 50 से अधिक विधायक ऋतब्रत के साथ चले जाते हैं, तो ममता बनर्जी के पास 30 से भी कम विधायक बचेंगे और उनसे मुख्य विपक्षी दल का तमगा भी छिन जाएगा. हालाँकि, खुद ऋतब्रत बंदोपाध्याय ने विधानसभा परिसर में मीडिया के कैमरों के सामने कूटनीतिक चुप्पी साधते हुए इसे महज एक अफवाह बताया और कहा कि वे काम के सिलसिले में आए हैं, लेकिन उनके पीछे खड़े विधायकों की फौज और बदले हुए तेवर बता रहे हैं कि ममता बनर्जी के पैरों के नीचे से बंगाल की सियासी जमीन खिसक चुकी है.
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