तमिलनाडु की राजनीति इन दिनों नए मोड़ पर खड़ी है. साल 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर खींचतान तेज हो गई है. मुख्य रूप से एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और उसकी सहयोगी कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे और सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर विवाद खुलकर सामने आ गया है. इस तनाव ने न सिर्फ गठबंधन की सेहत पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि राज्य की राजनीति में तीसरे विकल्प की संभावनाओं को भी हवा दे दी है.
सीट बंटवारे से सत्ता हिस्सेदारी तक
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस इस बार लगभग 35 सीटों की मांग कर रही है और साथ ही सत्ता में वापसी की स्थिति में मंत्रिमंडल में भागीदारी को पहले से सुनिश्चित करना चाहती है. कांग्रेस का तर्क है कि जब केंद्र में यूपीए सरकार थी तो डीएमके को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिला था, ऐसे में राज्य में कांग्रेस को साझेदारी से क्यों वंचित रखा जाए?
लेकिन स्टालिन ने सत्ता में हिस्सेदारी की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है. उनका स्पष्ट संकेत है कि डीएमके नेतृत्व साझा सत्ता के फार्मूले पर तैयार नहीं है. कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर द्वारा मदुरै कांग्रेस कमेटी से दोबारा प्रस्ताव पारित कराए जाने से मामला और उलझ गया है. इसे डीएमके नेतृत्व पर सार्वजनिक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.
कांग्रेस की रणनीति: दबाव या विकल्प?
तमिलनाडु कांग्रेस में इस मुद्दे पर अंदरूनी सक्रियता बढ़ गई है. संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के चेन्नई दौरे की चर्चा है, जहां 22 फरवरी को सीट बंटवारे पर औपचारिक बातचीत शुरू हो सकती है. कांग्रेस फिलहाल सार्वजनिक बयानबाजी से बच रही है, लेकिन उसके भीतर यह धारणा बन रही है कि सत्ताविरोधी माहौल और नए राजनीतिक समीकरणों के चलते डीएमके इस बार पहले जितनी मजबूत स्थिति में नहीं है.
इसी बीच, राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले प्रवीण चक्रवर्ती ने तमिलनाडु की वित्तीय स्थिति और कर्ज को लेकर स्टालिन सरकार पर सवाल उठाए थे , यहां तक कि उत्तर प्रदेश से तुलना भी की गई. इससे डीएमके की नाराजगी और बढ़ गई. हालात ऐसे बने कि वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम को स्टालिन से मुलाकात कर स्थिति संभालनी पड़ी.
विजय की एंट्री: तीसरी ताकत की दस्तक
इस राजनीतिक खींचतान का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK). विजय खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में पेश कर रहे हैं और कांग्रेस के असंतोष को अवसर में बदलने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.
यदि कांग्रेस डीएमके पर दबाव बनाकर अधिक सीटें या हिस्सेदारी हासिल नहीं कर पाती, तो क्या वह विजय के साथ जाने का जोखिम उठाएगी? यह सवाल अभी खुला है. हालांकि, कांग्रेस के लिए वर्षों पुराने सहयोगी को छोड़ना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब राज्य की राजनीति पारंपरिक द्रविड़ बनाम एआईएडीएमके ध्रुवीकरण पर टिकी रही है.
विपक्षी खेमे की स्थिति
दूसरी ओर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) और भारतीय जनता पार्टी भी अपने समीकरण साधने में जुटी हैं. यदि सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार गहराती है तो इसका सीधा लाभ विपक्ष या तीसरी ताकत को मिल सकता है. वोटों का बंटवारा चुनावी नतीजों को अप्रत्याशित बना सकता है.
गठबंधन का भविष्य: टूट या मजबूरी?
डीएमके और कांग्रेस दोनों ही जानते हैं कि अलग-अलग चुनाव लड़ना जोखिम भरा हो सकता है. कांग्रेस की राज्य में स्वतंत्र ताकत सीमित है, जबकि डीएमके को राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगियों की जरूरत रहती है. ऐसे में गठबंधन टूटने की संभावना कम, लेकिन तनावपूर्ण सहअस्तित्व की संभावना अधिक दिखती है.
22 फरवरी की बैठक इस गठबंधन के भविष्य की दिशा तय कर सकती है. क्या समझौता होगा, या तमिलनाडु की राजनीति एक नए त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ेगी- इसका जवाब आने वाले दिनों में सामने होगा.
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