हरियाणा की राजनीति में एक समय प्रभावशाली उपस्थिति रखने वाली कांग्रेस पार्टी आज आंतरिक गुटबाजी की गिरफ्त में है. बीते नौ महीनों से अधिक का वक्त गुजर जाने के बाद भी पार्टी राज्य में विधायक दल के नेता की नियुक्ति नहीं कर पाई है. प्रदेश में संगठनात्मक ढांचे की कमी और गुटबाजी के कारण पार्टी अपनी पकड़ कमजोर कर बैठी है.
गुटबाजी बनी सबसे बड़ी चुनौती
हरियाणा कांग्रेस दो प्रमुख खेमों में बंटी हुई दिखाई देती है. एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं, जिनका राज्य की राजनीति में अब भी गहरा असर है, वहीं दूसरी ओर कुमारी शैलजा और रणदीप सुरजेवाला के नेतृत्व में एक अलग गुट भी सक्रिय है. पहले इस गुट में किरण चौधरी भी थीं, लेकिन उनके पार्टी छोड़ने के बाद से यह गुट अपेक्षाकृत कमजोर पड़ा है. इन आंतरिक मतभेदों के चलते पार्टी लंबे समय से अपने सांगठनिक ढांचे को पूरी तरह से खड़ा नहीं कर पाई है.
ठप पड़ा संगठनात्मक ढांचा
पार्टी सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2013 के बाद से हरियाणा कांग्रेस की प्रदेश इकाई का पूर्ण रूप से गठन नहीं हो सका है. यह एक गंभीर स्थिति है, खासकर तब जब राज्य में विपक्ष को एक सशक्त और संगठित नेतृत्व की आवश्यकता है. संगठन में रिक्त पदों की भरपाई न होने से न केवल कार्यकर्ताओं में असंतोष है, बल्कि जमीनी स्तर पर पार्टी की पकड़ भी कमजोर हुई है.
नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू
अब पार्टी ने संगठन को फिर से सक्रिय करने की दिशा में कदम उठाए हैं. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ऑब्जर्वर के साथ हरियाणा के प्रभारी बीके हरिप्रसाद और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल बैठकें कर रहे हैं. यह प्रक्रिया दो दिन तक चलेगी और उसके बाद इस महीने के अंत तक सभी जिलों में नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी जाएगी.
हर जिले से 6 लोगों के पैनल बनाए गए हैं, जिनमें से एक को पार्टी हाईकमान जिला अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेगा. इस प्रक्रिया से उम्मीद की जा रही है कि पार्टी में लंबे समय से चले आ रहे संगठनात्मक ठहराव को तोड़ा जा सकेगा.
हिसार सबसे आगे, रोहतक भी पीछे नहीं
जिला अध्यक्ष बनने की होड़ में हिसार सबसे आगे है. वहां से करीब 200 आवेदन पार्टी को मिले हैं, जो बताता है कि स्थानीय स्तर पर पार्टी में सक्रियता है, लेकिन दिशा की कमी है. रोहतक, जो हुड्डा परिवार का गढ़ माना जाता है, वहां से भी 120 आवेदन आए हैं. इससे पता चलता है कि कार्यकर्ता अब भी पार्टी के भीतर अवसर देख रहे हैं.
संगठन के बाद नेता विपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की बारी
सूत्रों के मुताबिक, जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता की नियुक्ति की जाएगी. यह नियुक्तियाँ न केवल पार्टी के भीतर संतुलन बैठाने की कवायद होंगी, बल्कि आगामी चुनाव की रणनीति का खाका भी तय करेंगी.
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