कैंसर की दवाओं पर बड़ा फैसला
कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आने वाली दवाओं की आसमान छूती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण हलफनामा दाखिल किया है. सरकार ने कोर्ट को बताया है कि गैर-अनुसूचित कैंसर की दवाइयों पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के 30 फीसदी तक सीमित करने का निर्णय लिया गया है.
एक्सपर्ट कमेटी का गठन
दवाइयों की कीमतों में कमी लाने और उचित सूची तैयार करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने 9 अक्टूबर 2026 को स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशक की अध्यक्षता में एक ‘एक्सपर्ट कमेटी’ का गठन किया है. यह कमेटी 10 से 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.
NPPA का विचार और निर्देश
सरकार ने हलफनामे में बताया है कि एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट मिलने के बाद राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) इस पूरे मामले पर विचार करेगा और आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगा.
मरीजों को भारी आर्थिक राहत
सरकार के इस कदम से कैंसर की दवाओं के MRP में लगभग 20 से 70 फीसदी तक की भारी कमी आ सकती है. इससे मरीजों को सालाना लगभग 2500 करोड़ रुपये की बचत होने की उम्मीद है. साथ ही, इससे मरीजों की जेब से होने वाले खर्च में कमी आएगी, दवाओं की उपलब्धता सुधरेगी और कीमतों में पारदर्शिता बढ़ेगी.
पूर्व अनुभवों का हवाला
हलफनामे के मुताबिक, फरवरी 2019 में NPPA ने 42 चुनिंदा गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% तक सीमित किया था. उस कदम से 526 ब्रांडों के MRP में उल्लेखनीय कमी आई थी और कंपनियों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर मरीजों को सालाना 2,984 करोड़ रुपये की बचत हुई थी.
सुप्रीम कोर्ट की चिंता
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के ‘प्राइज टू रिटेलर’ (PTR) और ‘मैक्सिमम रिटेल प्राइस’ (MRP) के बीच के भारी अंतर पर गहरी चिंता व्यक्त की थी. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि
“फार्मा कंपनियों को कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें नहीं पता कि उनसे इस तरह कीमतें तय करने के लिए क्यों कहा जाता है? यह तो बर्बादी है… कैंसर की दवा जिसकी MRP 22,437 रुपये है, जबकि रिटेलर के लिए इसकी कीमत 3,520 रुपये है. कॉर्पोरेट अस्पताल तो इंडस्ट्री हैं, यह कोई सेवा नहीं है. आम आदमी को यह सब क्यों भुगतना पड़े?”
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हितधारकों से विचार-विमर्श
नई व्यवस्था तैयार करने से पहले दवा उद्योग, उपभोक्ता समूहों और अन्य संबंधित हितधारकों के साथ व्यापक बातचीत की गई है. हालांकि, कुछ संगठनों ने छोटे दवा निर्माताओं, रोजगार और दूरदराज के क्षेत्रों में दवाओं की उपलब्धता पर इसके संभावित असर को लेकर चिंता भी जताई है.
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