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मजिस्ट्रेट सिर्फ ‘सिविल मामला’ कहकर खारिज नहीं कर सकते शिकायत, दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई मजिस्ट्रेट CrPC की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने से इनकार करता है, तब भी शिकायत को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि मामला ‘सिविल प्रकृति’ का है.

Delhi High Court Mother Daughter Relationship Attempt to Murder Case

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई मजिस्ट्रेट दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने से इनकार करता है, तब भी शिकायत को केवल यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि मामला “सिविल प्रकृति” का है.

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता को अपने आरोपों के समर्थन में प्री-समनिंग एविडेंस (समन जारी होने से पहले साक्ष्य) पेश करने का अवसर दिया जाना चाहिए. जस्टिस मनोज जैन ने कहा कि सिविल विवाद और आपराधिक अपराध के बीच की रेखा कई बार बहुत पतली होती है. ऐसे में यह जरूरी है कि शिकायतकर्ता को यह साबित करने का मौका मिले कि मामले में आपराधिक तत्व मौजूद हैं. कोर्ट ने कथित आरोपी विकास गुप्ता सहित अन्य की ओर से दलीलें सुनने के बाद याचिका का निपटारा कर दिया है. साथ ही कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह शिकायतकर्ता को सबूत पेश करने की अनुमति दे और उसके बाद कानून के अनुसार उचित निर्णय ले.

निचली और पुनरीक्षण अदालत के आदेशों को दी गई चुनौती

यह मामला एम/एस प्रोग्रेसिव फिनलीज लिमिटेड की याचिका से जुड़ा था, जिसमें कंपनी ने निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें कुछ आरोपियों के खिलाफ IPC की धाराओं 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी), 421, 422 और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया गया था.

ट्रायल कोर्ट ने शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि आरोप अधिकतम अनुबंध के उल्लंघन (breach of agreement) को दर्शाते हैं, जो मूल रूप से एक सिविल विवाद है और उसे आपराधिक रंग देने की कोशिश की गई है. पुनरीक्षण अदालत ने भी इसी निष्कर्ष को सही माना था. हालांकि, हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों को समय से पहले किया गया आकलन बताया. अदालत ने कहा कि निचली अदालतों ने यह निष्कर्ष निकालने से पहले शिकायतकर्ता को अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य पेश करने का अवसर नहीं दिया, जो उचित नहीं था.

कोर्ट ने कहा कि भले ही धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग स्वीकार न की जाए, फिर भी मजिस्ट्रेट का यह दायित्व है कि वह शिकायतकर्ता को प्री-समनिंग एविडेंस पेश करने का अवसर दे, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मामला केवल सिविल विवाद है या उसमें आपराधिकता भी शामिल है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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