दिल्ली हाईकोर्ट ने शिक्षा के व्यवसायीकरण और ईडब्ल्यूएस छात्रों के बहिष्कार के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर दिल्ली सरकार, सीबीएससी और एनसीइआरटी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
कोर्ट 12 नवंबर को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा. दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है.
यह जनहित याचिका जसमीत सिंह साहनी की ओर से दायर की गई है. साहनी दून स्कूल के निदेशक है. यह याचिका अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत के माध्यम से दायर की गई है. दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि निजी स्कूल माता-पिता को मजबूर कर रहें है कि वे महंगी प्राइवेट पब्लिशर, किताबे और अतिरिक्त सामग्री खरीदें, जिससे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ रहा है.
स्कूलों पर आरटीई कानून के उल्लंघन का आरोप
याचिका में निजी स्कूलों द्वारा आरटीई कानून का उल्लंघन का आरोप लगाया गया है. याचिका में कहा गया है कि ईडब्ल्यूएस बच्चों से हर साल 10-12 हजार रुपए की प्राइवेट स्कूल किताबें खरीदने का दबाव बना रहे है. जबकि सरकार केवल 5000 प्रतिवर्ष ही देती है, जिससे कई परिवार बच्चों का नामांकन रद्द कराने को मजबूर हो जाते हैं.
इस याचिका में निजी स्कूलों द्वारा सीबीएसई के नियमों की अनदेखी का आरोप लगाया गया है. वर्ष 2016-17 के सीबीएसई सर्कुलर के बावजूद निजी स्कूल एनसीइआरटी किताबें इस्तेमाल नहीं कर रहे. एनसीइआरटी की किताबें मात्र 700 में उपलब्ध हैं, जबकि निजी स्कूल में वही किताब 10000 से ज्यादा में मिलता है.
नियामक ढांचे की कमी से स्कूल कर रहे मनमानी
याचिका में आगे कहा गया कि बच्चों के स्वास्थ्य पर असर डालता है. यह स्कूल बैग पॉलिसी 2020 का उल्लंघन है, जिसमें वजन बच्चे के शरीर के10 फीसदी से ज्यादा नही होना चाहिए. याचिकाकर्ता के मुताबिक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि एनसीइआरटी और सीबीएससी के पास किताबों की अनिवार्यता और पालन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है. नियामक ढांचे की कमी से स्कूल मनमानी कर रहे हैं.
फिक्स्ड वेट सिस्टम लागू किया जाए- याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया है कि फिक्स्ड वेट सिस्टम लागू किया जाए, जरूरत पड़ने पर ही प्राइवेट किताबें तय मानकों और दामों पर बिके. स्कूल बैग नीति का सख्ती से पालन कराया जाए. याचिका में यह भी कहा गया है कि EWS छात्रों के लिए आरटीई की धारा 12 (1)(C) का सख्ती से पालन करने के आदेश देने की मांग की गई है. इसके अलावे स्कूल बैग पॉलिसी 2020 को लागू करने की भी मांग की गई है. इसके अलावा नियम तोड़ने वाले स्कूलों के खिलाफ कड़ीं कार्रवाई की मांग की गई है.
याचिकाकर्ता जसमीत सिंह साहनी की माने तो शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, न कि व्यापार का साधन. आज यह व्यवस्था 55000 करोड़ की समानांतर अर्थव्यवस्था बन चुकी है, जिसमें माता-पिता और गरीब बच्चों का शोषण हो रहा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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