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9 साल से हिरासत में बंद आरोपी को मिली जमानत, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- त्वरित सुनवाई का अधिकार भ्रामक सुरक्षा नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने मकोका के तहत गिरफ्तार आरोपी जितेंद्र दीक्षित को 9 साल लंबी हिरासत और मुकदमे में देरी के आधार पर जमानत दी. अदालत ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान का मूल अधिकार है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि त्वरित सुनवाई का अधिकार एक भ्रामक सुरक्षा नहीं है. किसी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केवल इसलिए कम नहीं किया जा सकता है क्योंकि उसके खिलाफ महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम 1999 (मकोका) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

जस्टिस संजीव नरूला ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मकोका की धारा 3(1), 3(4) और 3(5) के तहत दर्ज मामले में आरोपी जितेंद्र दीक्षित को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया. आरोपी को कथित रूप से मनोज मोरखेरी सिंडिकेट का एक सक्रिय गिरोह का सदस्य बताया गया है.

वह लगभग 9 साल से न्यायिक हिरासत में है. उसके खिलाफ कई क्षेत्रों में हत्या, हत्या के प्रयास, फिरौती के लिए अपहरण और डकैती सहित अन्य अपराधों में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने का आरोप है. उसने लंबे समय से जेल में रहने एवं मुकदमा की सुनवाई में बेवजह देरी होने के अलावा अन्य आरोपियों को जमानत मिल जाने के आधार पर जमानत की मांग की थी. उसने अपनी जमानत याचिका में यह भी कहा था कि उसे कई मामलों में जमानत मिल गई है या उसका सजा निलंबित कर दिया गया है. इस सब को देखते हुए उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाए.

अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी का अधिकार प्रभावित

अदालत ने उसे जमानत पर रिहा करते हुए कहा कि उक्त कानून के तहत जमानत देने के लिए सख्त शर्ते लगाई गई है. लेकिन सरकार का भी जिम्मेदारी बनता है कि वह इस तरह के मुकदमों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाए. जिससे समय पर फैसला आ जाए.

उन्होंने यह भी कहा कि आरोपी के लंबे समय तक हिरासत में रहने के बावजूद मुकदमा अभी भी अपने निष्कर्ष पर नहीं पहुचा है. इस तरह से यह अनुच्छेद 21 के दायरे में आता है, जो त्वरित सुनवाई के अधिकार की गारंटी देता है. इसे देखते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया जाता है.

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-भारत एक्सप्रेस 

 



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