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सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने पर भी पैरोल और फरलो अर्जी पर निर्णय कर सकते हैं जेल अधिकारी: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि दोषसिद्धि के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित हो, तब भी जेल अधिकारी पैरोल और फरलो की अर्जी पर विचार कर सकते हैं.

दिल्ली हाईकोर्ट

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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हो तो जेल अधिकारी पैरोल और फरलो की अर्जी पर तब भी निर्णय ले सकते हैं. जस्टिस प्रतिबा मनिंदर सिंह और जस्टिस अमित शर्मा की पीठ ने कहा कि यदि किसी दोषी की दोषसिद्धि के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, तो दिल्ली कारागार नियम पैरोल और फरलो पर विचार करने पर रोक नहीं लगाता है.

अदालत ने यह भी कहा कि राहत दी जा सकती है या नहीं, यह एक अलग मुद्दा है और प्रत्येक निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है. फरलो और पैरोल में दोषी की जेल से अल्पकालिक अस्थायी रिहाई होती है.

पैरोल और फरलो पर निर्णय तथ्यों पर निर्भर करेगा

पीठ ने कहा कि यह एक बिल्कुल अलग प्रश्न है कि यदि सुप्रीम कोर्ट किसी विशेष अनुमति याचिका या अपील के माध्यम से मामले पर विचार कर रहा है, तो क्या किसी विशिष्ट मामले के तथ्यों के आधार पर जेल अधिकारियों को पैरोल या फरलो देना चाहिए. गुण-दोष के आधार पर पैरोल और फरलो देना या न देना प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा.

पैरोल किसी कैदी को किसी विशिष्ट आवश्यकता को पूरा करने के लिए दी जाती है, जबकि फरलो बिना किसी कारण के निर्धारित वर्षो की सजा काटने के बाद बतौर सप्ताहिक अवकाश की तरह दी जा सकती है.

पीठ ने कहा कि ऐसी स्थिति हो सकती है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने किसी विशेष दोषी की सजा निलंबित करने या उसे जमानत देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया हो. ऐसे मामलों में जेल अधिकारियों को इस बात की गहन जांच करने की आवश्यकता होगी कि क्या दोषी को पैरोल या फरलो दिया जा सकता है.

पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिकारी अपनी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पैरोल या फरलो को अधिकार के रूप में प्रदान किया जाना चाहिए.

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-भारत एक्सप्रेस 



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