दिल्ली हाई कोर्ट ने विकलांगता को लेकर एक बड़ा आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा कि उच्च शैक्षणिक संस्थानों में मानक विकलांगता (कम से कम 40 फीसदी प्रमाणित विकलांगता) वाले व्यक्तियों के लिए आरक्षित सीटें अगर किसी कारण वश भर नहीं पाती हैं, तो उन्हें खाली न रखा जाए. जस्टिस संजीव नारूला की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस तरह का तंत्र बनाने से विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 की भावना और उद्देश्यों को पूरा किया जा सकेगा.
कोर्ट ने विधि आयोग से कहा है कि वह इस मुद्दे पर स्पष्ट सिफारिशें केंद्र सरकार को दे ताकि जरूरी विधायी संशोधन किए जा सकें. इसके साथ ही कोर्ट ने उम्मीद जताई कि सरकार भी इस दिशा में गंभीर कदम उठाएगी. कोर्ट ने मामले में विधि आयोग को आवश्यक विधायी बदलावों के सुझाव देने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने सुझाव दिया है कि ऐसी सीटों को या तो अगले शैक्षणिक वर्ष तक आगे बढ़ाया जाए या फिर अन्य योग्य विकलांग अभ्यर्थियों को स्थानांतरित किया जाए.
शैक्षणिक संस्थानों के लिए निर्देश
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरक्षित सीटें खाली रह जाने का सीधा असर विकलांग समुदाय के शिक्षा के अवसरों पर पड़ता है. अगर ये सीटें सामान्य श्रेणी में स्थानांतरित किया जाता है तो अधिनियम का वास्तविक उद्देश्य कमजोर हो जाता है. कोर्ट ने कहा कि आरक्षित सीटों का लाभ हर हाल में विकलांग व्यक्तियों तक पहुचना चाहिए, चाहे वह उसी शैक्षणिक सत्र में हो या अगले शैक्षणिक सत्र में.
बता दें कि विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 में लागू किया गया था. Rights of Persons with Disabilities Act शिक्षा, रोजगार और सार्वजनिक जीवन में विकलांग व्यक्तियों के लिए समान अवसर और अधिकार सुनिश्चित करता है. इस अधिनियम के तहत उच्च शैक्षिण संस्थानों में कम से कम 5 फीसदी सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है.
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-भारत एक्सप्रेस
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