दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल ही में जैन सभा धर्मार्थ ट्रस्ट से देवी पद्यावती की मूर्ति के लिए एक स्थान खाली रखने का निर्देश दिया है. उस मूर्ति को पहले जीर्णोद्धार के दौरान जैन मंदिर से हटा दिया गया था. जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने अपने आदेश में कहा कि मूर्ति दशकों से मंदिर में स्थापित थी. उसकी पूजा की जाती थी. उसे जीर्णोद्धार के बाद वहां से क्यों हटाया जाना चाहिए। कोर्ट 28 अगस्त की इस मामले में अगली सुनवाई करेगा.
जैन मंदिर के गर्भगृह में देवी पद्यावती की मूर्ति थी स्थापित
जैन मंदिर के गर्भगृह में वर्ष 1978 में देवी पद्यावती की मूर्ति स्थापित की गई थी. जीणोद्धार के दौरान वर्ष 2018 में मूर्ति को उनके स्थानों से हटाकर मंदिर के एक कमरे में स्थानांतरित कर दिया गया था. लेकिन अन्य मूर्तियों के साथ पद्यावती की मूर्ति को उसके स्थान पर वापस नहीं रखा गया.
ट्रस्ट किसी अन्य तीर्थकर की मूर्ति रखने की बना रहा योजना
ट्रस्ट उसके स्थान पर किसी अन्य तीर्थकर की मूर्ति रखने की योजना बना रहा है. उसे देखते हुए अदालत में मुकदमा किया गया. निचली अदालत ने उसे खारिज कर दिया. उसने कहा था कि भगवान सर्वव्यापी हैं. किसी भी स्थान पर मूर्ति की पूजा की जा सकती है, चाहे वह गर्भगृह में हो या मंदिर में किसी अन्य स्थान पर. उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई और अपील दाखिल की गई.
40 सालों से मंदिर में थी मूर्ति
कोर्ट ने निचली अदालत ने देवता के अधिकार पर निर्णय लिए बिना मुकदमा खारिज करने को लेकर आपत्ति जताई. उसने कहा कि मूर्ति 40 सालों से मंदिर में थी. निचली अदालत ने सरसरी तौर पर मुकदमे को खारिज कर दिया है. इस तरह से आस्था के मामलों की उपेक्षा नहीं की जा सकती हैं. कोर्ट ने फिर अंतरिम आदेश पारित कर ट्रष्ट को निर्देश दिया कि वह मूर्ति के लिए निर्धारित सीट खाली रखे, जबकि मूर्ति के लिए सभी अनुष्ठान उसी कमरे में किए जाए जिसमें उसे रखा गया है.
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