दिल्ली हाई कोर्ट ने दहेज हत्या के मामले में आरोपी की ओर से दायर अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है. साथ ही कोर्ट ने आरोपी के माता-पिता को भी अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने टिप्पणी करते हुए कहा कि युवती की अप्राकृतिक मौत से संबंधित एफआईआर दर्ज करने में उसकी शादी की पूरी अवधि से भी अधिक समय लग गया.
‘शोक संतप्त माता-पिता से प्रशिक्षित जांचकर्ता जैसी उम्मीद नहीं’
एक पिता जिसने अभी-अभी अपनी जवान बेटी की मौत देखी है, जिसका शव अभी भी मुर्दाघर में पड़ा है और जिसकी शादी उसने कुछ ही महीने पहले करवाई थी, उससे यह उम्मीद करना उचित नहीं है कि वह अपनी बेटी के निधन के सदमे से उबरते हुए, उसके वैवाहिक जीवन का पूरा इतिहास सटीकता और पूर्णता से बयान कर सके. कोर्ट ने कहा कि कानून ऐसे दुखद हादसे के तुरंत बाद शोक संतप्त माता-पिता से किसी प्रशिक्षित जांचकर्ता की तरह शांत रहने या किसी सावधानीपूर्वक तैयार किए गए शिकायतकर्ता की तरह सब कुछ याद रखने की अपेक्षा नहीं कर सकता.
सीढ़ियों से गिरने की बात कही, बाद में निकली आत्महत्या
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे परेशान करने वाली बात यह थी कि पीड़िता के पिता को शुरू में उसके ससुराल वालों ने बताया था कि वह सीढ़ियों से गिर गई थी, लेकिन बाद में पता चला कि उसने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस आदेश की लंबाई बढ़ाने के लिए ऐसा नहीं किया जा रहा है, बल्कि व्यवस्था में ऐसे लोगों को स्पष्ट संदेश देने के लिए किया जा रहा है जो इस तरह की घटनाओं के प्रति असंवेदनशीलता दिखाते हैं, कि न्याय व्यवस्था उनके प्रति कोई नरमी नहीं दिखाएगी.
‘दर-दर भटकना पड़ा पिता को’, कोर्ट ने दिए कड़े निर्देश
हाई कोर्ट ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पीड़िता के पिता को अपनी युवा बेटी की अप्राकृतिक मौत के संबंध में एफआईआर दर्ज कराने और जांच कराने के लिए दर-दर भटकना पड़ा. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में विवाह के कुछ समय बाद ही हुई किसी युवती की अप्राकृतिक मौत के संबंध में, विशेष रूप से जहां दहेज से संबंधित उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हों, इन मामलों को कम समय सीमा में सूचीबद्ध किया जाना चाहिए ताकि एफआईआर दर्ज करने और जांच शुरू करने का मुद्दा महीनों तक अनसुलझा न रह जाए.
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