उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर कुछ रिटायर्ड जजों और कार्यकर्ताओं द्वारा दिए गए राजनीतिक बयान का पूर्व न्यायधीशों ने इसका विरोध करते हुए एक पत्र जारी किया है. जिन न्यायाधीशों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए है, उनमें पूर्व सीजेआई जस्टिस पी. सदाशिवम, पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई, पूर्व जस्टिस ए के सीकरी, जस्टिस एम. आर शाह और पूर्व जस्टिस सुरेश कैत शामिल है. उन्होंने अन्य सेवानिवृत्त जजों से अपील की है कि वे राजनीतिक बयानों से दूरी बनाए रखें और न्यायपालिका को राजनीति से अलग रखे.
पूर्व जजों ने यह भी कहा है कि ऐसे बयान न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक पक्षपात को बढ़ावा देते हैं, जिससे संस्था की गरिमा और निष्पक्षता को नुकसान होता है.
उनका मानना है कि न्यायिक स्वतंत्रता राजनीतिक आलोचना से खतरे में नहीं आती, बल्कि बार-बार दिए जा रहे पक्षपाती बयानों से उसकी छवि धूमिल होती है. उन्होंने स्पष्ट किया कि उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बने सेवानिवृत्त जज को अन्य प्रत्याशियों की तरह राजनीतिक बहस का सामना करना चाहिए, न कि न्यायिक स्वतंत्रता की ढाल का सहारा लेना चाहिए.
अमित शाह के बयान के बाद बढ़ा विवाद
बता दें कि दो दिन पहले ही 18 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के एक समूह ने सलवा जुडूम फैसले को लेकर विपक्ष के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बी सुदर्शन रेड्डी पर गृह मंत्री अमित शाह के बयान को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था. उसके जवाब में 56 पूर्व न्यायधीशों ने यह ओपन लैटर जारी कर पूर्व न्यायाधीशों से ऐसे मामलों में अपनी प्रतिक्रिया नही देने की अपील की है.
दरअसल गृहमंत्री अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रेड्डी पर नक्सलवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया था. उन्होंने दावा किया था कि सलवा जुडूम फैसले के बिना वामपंथी उग्रवाद 2020 तक समाप्त हो गया होता.
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