केतन हत्या मामले में पुलिस इस हत्याकांड के छिपे हुए राज का पता लगाने के लिए मुख्य आरोपी सिया गोयल का पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) करा रही है. सिया ने भी इस टेस्ट को लेकर अपनी कानूनी मंजूरी दे दी है, क्योंकि कानून के अनुसार किसी भी आरोपी का पॉलीग्राफ टेस्ट कराने के लिए पहले उसकी लिखित या मौखिक मंजूरी होना बेहद जरूरी है. पुणे पुलिस ने सिया गोयल के साथ-साथ 22 साल के चेतन चौधरी, दोनों का पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की इजाजत के लिए संबंधित कोर्ट में अर्जी भी दाखिल कर दी है.
अदालत में निर्णायक सबूत नहीं है पॉलीग्राफ टेस्ट
पॉलीग्राफ टेस्ट अपने आप में कोई निर्णायक या अदालती रूप से स्वीकार्य साक्ष्य (Admissible Evidence) नहीं होता है; केवल इस टेस्ट की रिपोर्ट के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराया या निर्दोष घोषित नहीं किया जा सकता है. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ‘सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य’ के वर्ष 2010 में दिए गए अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति का पॉलीग्राफ टेस्ट उसकी स्वतंत्र और स्वैच्छिक सहमति के बिना नहीं कराया जा सकता है.
यदि यह टेस्ट आरोपी की बिना सहमति के कराया जाता है, तो यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20(3) (स्वयं के खिलाफ गवाही न देने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन होगा. पॉलीग्राफ टेस्ट का मुख्य उद्देश्य केवल जांच एजेंसी को मामले से जुड़े कुछ छिपे हुए सुराग उपलब्ध कराना है. यदि उन सुरागों के आधार पर कोई स्वतंत्र साक्ष्य जैसे हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी, फॉरेंसिक रिपोर्ट, दस्तावेज या अन्य प्रमाण प्राप्त होते हैं, तो वही साक्ष्य अदालत में महत्व रखते हैं, स्वयं पॉलीग्राफ टेस्ट की रिपोर्ट नहीं.
सिया के लिए फांसी की मांग
इस बीच, आरोपी सिया को फांसी की सजा दिए जाने की लगातार मांग की जा रही है, यहाँ तक कि खुद सिया के माता-पिता ने भी उसके लिए फांसी की सजा की मांग की है. हालांकि, भारतीय न्यायिक इतिहास में आजादी के बाद से अभी तक सिर्फ एक ही महिला को फांसी दी गई है, क्योंकि अदालतें केवल ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) जघन्य अपराधों में ही मृत्युदंड की सजा सुनाती हैं.
आजादी के बाद रतनबाई ही देश की मात्र एक ऐसी महिला थीं, जिन्हें वर्ष 1955 में फांसी के फंदे पर लटकाया गया था. रतनबाई जैन दिल्ली के एक फर्टिलिटी/स्टेरिलिटी क्लीनिक में मैनेजर के पद पर कार्यरत थीं. उन्हें अपने पति के चरित्र पर गहरा शक था कि उनके पति के तीन अलग-अलग लड़कियों के साथ अवैध संबंध हैं. इसी शक के पागलपन के कारण उन्होंने उन तीनों लड़कियों की बेरहमी से हत्या कर दी थी.
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एक दशक से कर रही हैं फैसले का इंतजार
एक आधिकारिक आंकड़े के अनुसार, भारत में अभी तक कुल 571 कैदियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है, जिनमें से 21 महिलाएं शामिल हैं. इन सभी महिलाओं पर आतंकवाद, सामूहिक हत्याकांड (Mass Murder), ऑनर किलिंग (शान की खातिर हत्या) और अन्य जघन्यतम अपराधों के मामलों में दोष पूरी तरह साबित हो चुका है. वर्तमान में, इनमें से चार महिलाएं एक दशक से भी अधिक समय से अपनी फांसी की सजा पर अमल (Exectution) होने का इंतजार कर रही हैं. ये महिला कैदी अलग-अलग राज्यों और विभिन्न सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियों से आती हैं.
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