सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत जेल में बंद एक कैदी की रिहाई में हुई कथित लापरवाही के मामले में गहन जांच के लिए 25 अगस्त को अगली सुनवाई निर्धारित की है. जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान यूपी सरकार की ओर से पेश वकील से अनुपालन रिपोर्ट ली, जिसमें बताया गया कि कोर्ट के आदेशानुसार कैदी को पांच लाख रुपये का अंतरिम मुआवजा उसके खाते में ट्रांसफर कर दिया गया है. हालांकि, कोर्ट ने जेल अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताई और कहा कि दोषी अधिकारी पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है.
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी कि यह स्वतंत्रता का मामला है और ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजी (कारागार) से पूछा था कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जाए. डीजी ने वादा किया कि वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जेल अधीक्षकों को दिशा-निर्देश देंगे. कोर्ट ने जांच के दायरे में यह तय करने को कहा कि क्या रिहाई में जानबूझकर देरी की गई, कौन जिम्मेदार है, और 27 मई 2025 के बाद कैदी को हिरासत में क्यों रखा गया. जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि वे इस मामले को नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि कई लोग ऐसी स्थिति में जेल में सड़ सकते हैं.
मामला तब उजागर हुआ जब कैदी ने संशोधित याचिका दायर कर कहा कि उसे अप्रैल में जमानत मिलने के बावजूद रिहा नहीं किया गया, क्योंकि जमानत आदेश में उत्तर प्रदेश धर्मांतरण रोकथाम कानून 2021 की एक उप-धारा का उल्लेख नहीं था. कोर्ट ने इसे न्याय का मजाक करार दिया और कहा कि आदेश वैध है, न कि जाली. कोर्ट ने अधिकारियों को संवेदनशील बनाने की जरूरत पर जोर दिया. यूपी सरकार ने रिपोर्ट में दावा किया कि मुआवजा दे दिया गया, लेकिन कोर्ट ने जांच पूरी होने तक कार्रवाई टाल दी.
यह मामला न केवल एक कैदी की रिहाई से जुड़ा है, बल्कि जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और कानूनी प्रक्रिया में सुधार की मांग को भी उठाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट का यह रुख भविष्य में ऐसी लापरवाहियों को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है.
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