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सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख; ‘जागीर खत्म तो अधिकार भी खत्म’, सालार जंग के वारिसों को नहीं मिलेगी 102 एकड़ जमीन

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के रंगा रेड्डी जिले की 102 एकड़ वन भूमि को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तेलंगाना वन विभाग के अधिकारों को बरकरार रखा है.

सुप्रीम कोर्ट ने रंगा रेड्डी जिले में 102 एकड़ वन भूमि को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने तेलंगाना वन विभाग के अधिकारों को बरकरार रखा है. साथ ही कोर्ट ने सालार जंग III के वारिस होने का दावा करने वाले व्यक्तियों के मालिकाना हक के दावों को खारिज कर दिया है. इस जमीन को लेकर तीन लोगों ने सालार जंग III के कानूनी वारिस या नॉमिनी के तौर पर मालिकाना हक का दावा किया था.

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच ने यह आदेश दिया है. कोर्ट ने इस जमीन को दो महीने के भीतर आरक्षित वन विभाग घोषित किया जाए. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सभी शहरों में हरियाली वाली जगहें कम हो रही हैं और हैदराबाद और सिकंदराबाद भी इसके अपवाद नही है. कोर्ट ने फैसले में स्पष्ट किया है कि जागीर खत्म होने के बाद जमीन सरकार के पास चली गई थी.

ऑपरेशन पोलो के बाद खत्म हुई जागीरें

कोर्ट ने कहा कि जागीरदार को केवल आजीवन हित होता है, उसे हस्तांतरण या असाइनमेंट का अधिकार नहीं. इसलिए इसपर दावा टिकाऊ नही है. कोर्ट ने अपने फैसले में 1948 का जिक्र किया है. जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो शुरू किया था, जिसके परिणामस्वरूप हैदराबाद के निजाम ने सरेंडर कर दिया था. इसके बाद हैदराबाद राज्य भारत संघ का हिस्सा बन गया और 1949 में जागीर उन्मूलन विनियमन लागू किया गया, जिससे तत्कालीन राज्य में सभी जागीरें खत्म हो गई.

बता दें कि सालार जंग तृतीय हैदराबाद के इतिहास में एक प्रमुख नाम रहे है और 1912 में निजाम शासन के दौरान प्रधानमंत्री नियुक्त हुए थे. इस मामले में दो व्यक्तियों ने स्वयं को सालार जंग तृतीय के मामा दिवंगत अब्दुल्ला के जीवित पुत्र बताते हुए दावा किया था.

वही मीर जाफर अली खान यह कहते हुए अधिकार जताया कि वे सालार जंग तृतीय की संपत्तियों से जुड़े मामलों के लिए अदालत द्वारा नियुक्त नॉमिनी है.

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-भारत एक्सप्रेस



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