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ओबीसी आरक्षण और क्रीमीलेयर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर का निर्धारण किस प्रकार किया जाएगा इसको लेकर बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सरकारी, पीएसयू और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है.

आरक्षण का आधार: जाति-आधारित सामाजिक पिछड़ापन

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि क्रीमी लेयर तय करने के मामले में सरकारी कर्मचारियों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने कहा है कि सरकार, पीएसयू या निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को ओबीसी की क्रीमी लेयर में शामिल या बाहर करने के लिए समान कानून होना चाहिए.

कोर्ट ने आगे ये भी कहा कि समान पद या श्रेणी में कार्यरत व्यक्तियों के बीच केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वे सरकार में कार्यरत हैं या सार्वजनिक या निजी क्षेत्र में ऐसा करना शत्रुतापूर्ण भेदभाव होगा. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि आरक्षण का आधार जाति-आधारित सामाजिक पिछड़ापन है, और इस सिद्धांत को समान स्थिति वाले लोगों के बीच अनुचित भेदभाव करके कमजोर या विकृत नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने क्यों लिया फैसला?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दो अभ्यर्थियों के मामले में आया है. जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में ओबीसी श्रेणी में सफलता प्राप्त की थी, लेकिन उन्हें क्रीमी लेयर में मानकर आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया. रोहित नाथन ने 2012 में सिविल सेवा परीक्षा में ओबीसी श्रेणी में ऑल इंडिया रैंक 174 हासिल की थी. उनके पिता निजी कंपनी एचसीएल टेक्नोलॉजी में कार्यरत थे, और उनकी आय क्रीमी लेयर की निर्धारित सीमा से अधिक थी. इसी आधार पर रोहित नाथन को क्रीमी लेयर में माना गया.

हालांकि उन्हें मेरिट के आधार पर यूपीएससी की सिफारिश पर इंडियन पुलिस सर्विस में अनारक्षित श्रेणी के तहत आवंटित कर दिया गया. लड़की नाथन ओबीसी के तहत इंडियन फॉरेन सर्विस में नियुक्ति की मांग कर रहे थे. इसको लेकर उन्होंने कैट के चेन्नई बेंच में याचिका दायर की थी. जिसके बाद मामला हाई कोर्ट गया और हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुचा.

क्या है दूसरा मामला?

दूसरा मामला जी. बाबू का था, जिन्होंने 2013 की सिविल सेवा परीक्षा में ओबीसी श्रेणी में 629 रैंक हासिल की. उनके पिता एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में सीनियर इंजीनियर थे. उनकी आय भी क्रीमी लेयर की सीमा से अधिक होने के कारण जी. बाबू को भी क्रीमी लेयर में रखा गया.

इसके बाद उन्होंने कैट, के चेन्नई ब्रांच में याचिका दायर की, जिसकी याचिका पर फैसला आने के बाद मामला हाई कोर्ट गया और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट पहुचा जिसपर कोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला दिया है.

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-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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