ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) के छात्र अक्षय त्रिपाठी को जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में कथित रूप से हिस्सा लेने और भीड़ जुटाने के आरोप में ₹5 लाख का नोटिस जारी किए जाने का मामला सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) पहुंच गया है. CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष इस मामले को उठाया गया. सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि वह गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी (DM) को नोटिस जारी कर इस पर विस्तृत जवाब तलब करेगी.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन और DM का स्पष्टीकरण
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को अवगत कराया गया कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद गौतमबुद्ध नगर के जिला प्रशासन द्वारा छात्र को ₹5 लाख का भारी-भरकम नोटिस जारी किया गया है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस पूर्व आदेश की सीधी अवमानना है, जिसमें साफ कहा गया था कि प्रदर्शनों में शामिल होने वाले छात्रों के खिलाफ कोई भी कठोर दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई नहीं की जाएगी.
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए थे कि छात्रों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, और न्यायालय इस मामले में जिलाधिकारी से सीधा जवाब मांगेगा.
दूसरी ओर, गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी प्रशासन ने अक्षय त्रिपाठी को ₹5 लाख का नोटिस मिलने से जुड़े दावों को खारिज कर दिया है. जिला प्रशासन की ओर से जारी आधिकारिक सूचना के अनुसार, सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इन खबरों से अनावश्यक भ्रम पैदा किया जा रहा है, और प्रशासन का दावा है कि ऐसा कोई नोटिस त्रिपाठी को जारी नहीं किया गया है.
एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की कार्रवाई
प्रशासनिक दस्तावेजों और रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्रेटर नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा छात्र पर शांति भंग से जुड़ी कानूनी धाराओं के तहत ₹5 लाख का मुचलका/जुर्माना भरने से जुड़ा नोटिस तैयार किया गया था.
नोटिस की तिथि और आधार: अक्षत (अक्षय) त्रिपाठी को 4 सितंबर को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत यह नोटिस जारी किया गया था.
पुलिस रिपोर्ट: यह कार्रवाई इकोटेक-1 (Ecotech-I) थाने के एक सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट के आधार पर की गई है.
प्रमुख आरोप: नोटिस में आरोप लगाया गया है कि छात्र ने जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के लिए लोगों को एकजुट करने और भीड़ जुटाने का प्रयास किया था.
इस पूरी कार्रवाई के सामने आने के बाद SFI (स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) समेत कई छात्र संगठनों ने सरकार और स्थानीय प्रशासन के इस कदम की कड़ी निंदा की है. छात्र संगठनों ने इसे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे युवाओं और छात्रों को डराने-धमकाने की एक सुनियोजित कोशिश करार दिया है. अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में हस्तक्षेप के बाद जिला प्रशासन के रुख और अगली कानूनी कार्यवाही पर सभी की नजरें टिकी हैं.
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