सुप्रीम कोर्ट.
सुप्रीम कोर्ट ने एक वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी की है. जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता केवल अलग हुए जोड़ों को फिर से जोड़ने के लिए नही की जाती है. कोर्ट ने इस बात पर जोड़ दिया कि सौहार्दपूर्ण अलगाव भी मध्यस्थता प्रक्रिया का एक वैध और स्वीकार्य परिणाम हो सकता है.
कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक मामलों में जब हम मध्यस्थता के लिए कहते है, तो समस्या यह होती है कि पक्षकारों को लगता है कि हम उन्हें साथ रहने के लिए कह रहे हैं. लेकिन हमें इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि वे साथ रहें या नही.
मध्यस्थता का मतलब साथ रहने का निर्देश नहीं
कोर्ट ने कहा कि यह देखना होगा कि क्या मामला सुलझ सकता है क्या? अदालत ने कहा कि वैवाहिक मामलों में जब हम मध्यस्थता कहते हैं तो बार को लगता है कि हम पक्षों को.एक.साथ रहने का निर्देश दे रहे है. कोर्ट ने कहा कि हम सिर्फ समाधान चाहते है. दोनों पक्षों को साथ रहने का आग्रह नही करते. कोर्ट ने यह भी कहा कि हम चाहते है कि पक्ष एक साथ रहें. लेकिन अलग होना भी एक समाधान हो सकता है.
बता दें कि बेंगलुरु में आयोजित एक समारोह में जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि वैवाहिक विवाद के सबसे बड़े पीड़ित बच्चे होते हैं. जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि फैमिली कोर्ट में मामलों के पहुचने से पहले अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में पूर्व-मुकदमेबाजी सुलह, मध्यस्थता की प्रक्रिया अनिवार्य होनी चाहिए.
उन्होंने कहा था कि परिवार मानव संगठन की मूल इकाई और सामाजिक स्थिरता की नींव है. उन्होंने पश्चिमी समाज के मूल्यों की तुलना में यह बताया था कि भारतीय समाज समुहिकतावादी है, जो परस्पर निर्भरता और सहयोग को बढ़ावा देता है., जबकि पश्चिमी समाज व्यक्तिवादी होता हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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