(सुप्रीम कोर्ट)
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व भारतीय व्यापार सेवा (ITS) अधिकारी एस.एस. दास को एक महत्वपूर्ण फैसले में बड़ी राहत दी है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने एस.एस. दास को सेवाकाल पूरा होने से पहले अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के केंद्र सरकार के आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है.
अदालत ने सरकार के इस कदम को मनमाना और दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अधिकारी को मानहानि और मुकदमे के खर्च के रूप में कुल 15 लाख रुपये (9 लाख रुपये मानहानि और 6 लाख रुपये मुकदमे का खर्च) मुआवजा दे.
अचानक डेडवुड नहीं कहा जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक बेदाग सेवा रिकॉर्ड और लगातार उत्कृष्ट मूल्यांकन (Outstanding Grading) वाले अधिकारी को बिना किसी नए प्रतिकूल रिकॉर्ड (Adverse Entry) के अचानक ‘डेडवुड’ (Deadwood) यानी नाकारा नहीं बताया जा सकता है.
अदालत ने कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति के प्रावधानों का उद्देश्य ऐसे सरकारी कर्मचारियों को सेवा से हटाना होता है जो जनहित की कसौटी पर अपनी उपयोगिता पूरी तरह खो चुके हैं. लेकिन जिस अधिकारी को उसकी योग्यता के आधार पर संयुक्त सचिव के पद पर पदोन्नति दी गई हो, उसे अचानक डेडवुड बताकर जबरन रिटायर करने के पीछे ठोस कारण होना जरूरी है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरी प्रक्रिया से ऐसा प्रतीत होता है कि एस.एस. दास को किसी भी कीमत पर हटाने का निर्णय पहले ही लिया जा चुका था और बाद में उसे सही ठहराने के लिए कारण गढ़े गए. सुप्रीम कोर्ट ने इसे उच्च पदों का गंभीर दुरुपयोग करार दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश
सम्मानजनक विदाई: कोर्ट ने विदेश व्यापार महानिदेशक (DGFT) को निर्देश दिया है कि एस.एस. दास को उनके कार्यालय में ससम्मान आमंत्रित किया जाए और उन्हें वैसी ही औपचारिक विदाई दी जाए जैसी सेवानिवृत्ति के बाद सामान्यतः दी जाती है.
सेवा लाभ: अधिकारी को सेवा से जुड़े सभी वित्तीय और अन्य लाभ इस प्रकार दिए जाएं मानो उन्हें कभी अनिवार्य रूप से रिटायर किया ही नहीं गया हो.
जानें क्या है पूरा मामला?
एस.एस. दास 1989 बैच के भारतीय व्यापार सेवा (ITS) के अधिकारी थे. उन्हें 1994 में विदेश व्यापार महानिदेशक में उप महानिदेशक और 2001 में संयुक्त महानिदेशक बनाया गया. वर्ष 2014 में उन्हें महानिदेशालय में अतिरिक्त निदेशक नियुक्त किया गया. 16 नवंबर 2017 को उन्हें संयुक्त सचिव स्तर के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में और इसके बाद 27 फरवरी 2018 को नियमित पदोन्नति दी गई थी.
पदोन्नति मिलने के मात्र दो महीने बाद ही वर्ष 2018 में उनकी पांच साल की नौकरी शेष रहते हुए उन्हें बेकार बताकर जबरन रिटायर कर दिया गया था, जबकि उस समय उनके खिलाफ कोई नया प्रतिकूल रिकॉर्ड नहीं था. इस कार्रवाई के खिलाफ एस.एस. दास ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहाँ लंबी कानूनी लड़ाई के बाद उन्हें यह न्याय मिला है.
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