Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या जन्म के आधार पर मंदिर में प्रवेश रोकना जायज?

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ में सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले पर सुनवाई जारी है.

SUPREME COURT

सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर मामले में महिलाओं को प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ में चल रही सुनवाई 22 अप्रैल को भी जारी रहेगी. मामले की सुनवाई के दौरान सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर के मुख्य पुजारी से पूछा है कि क्या संविधान उस श्रद्धालु की रक्षा नही करेगा, जिसे देवता को छूने की अनुमति नहीं है.

कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब पुजारी की ओर से पेश वकील द्वारा कहा गया है जब कोई  भक्त पूजा के लिए मंदिर जाता है, तो वह देवता की विशेषताओं के विरोध में नहीं हो सकता. इस पर सबरीमाला के वकील वी. गिरी ने कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं. पूजा देवता की विशेषताओं के उलट नहीं हो सकती. भगवान अयप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुरूप तय की गई हैं. सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कुछ मंदिरों में शिवलिंग पर जल चढ़ा सकते हैं, जबकि अन्य में आप मूर्ति को छू भी नही सकते. यह छुआछूत से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूजा की एक विशेष विधि (अनुष्ठान) का हिस्सा है.

मंदिर के पक्ष की ओर से पेश वकील ने कहा कि पूजा की परंपराएं और अनुष्ठान धर्म का अभिन्न हिस्सा है और इन्हें धार्मिक अधिकार के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए. उनके अनुसार श्रद्धालु को मंदिर की परंपराओं और देवता के.स्वरूप को स्वीकार करना होता है.

श्रद्धालु और देवता के बीच भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने अहम और महत्वपूर्ण सवाल किया, “,मैं पूरी श्रद्धा के साथ मंदिर जाता हूं. मेरा मानना है कि वह.देवता मेरा रचयिता है. लेकिन वहां मुझे बताया जाता है कि मेरे जन्म या वंशावली के कारण मुझे स्थायी रूप से मूर्ति को छूने की अनुमति नहीं है. क्या ऐसी स्थितिमें संविधान उस श्रद्धालु के बचाव में नहीं आएगा? रचयिता और उसकी रचना के बीच ऐसा भेदभाव कैसे हो सकता है? जन्म के आधार पर यह स्थायी अक्षमता कैसे जायज है और यह देवता को अपवित्र कैसे कर सकती है?”

इस पर जस्टिस पी. बी. वराले ने भी पूछा कि क्या तकनीक और शिक्षा के इस दौर में एक आस्तिक को तर्कशील नहीं होना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ सिर्फ सबरीमाला को लेकर ही सुनवाई नही कर रही है, बल्कि अदालत अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े कई अन्य मुद्दों पर भी विचार कर रही है.

ये भी पढ़ें: ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता बर्दाश्त नहीं’, जजों की सुरक्षा पर दिल्ली हाई कोर्ट ने पुलिस के रवैये पर जताई कड़ी नाराजगी

Also Follow Bharat Express on Youtube

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital