सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में हाल ही में हुई एक नाबालिग लड़की के साथ चलती स्लीपर बस में हुए दुष्कर्म (गैंगरेप) की घटना पर गंभीर रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया है. अदालत ने इस दर्दनाक घटना की तुलना वर्ष 2012 के कुख्यात ‘निर्भया कांड’ से करते हुए कानून-व्यवस्था की विफलता और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा कि ये घटनाएं एक बार फिर 2012 के निर्भया केस की दर्दनाक यादें ताजा करती हैं. अदालत ने कहा कि केवल मौखिक एकजुटता (Solidarity) दिखाना काफी नहीं है, बल्कि अब सीधे तौर पर जवाबदेही तय की जानी चाहिए.
अदालत की मुख्य टिप्पणियां और सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने इन जघन्य वारदातों को कानून लागू करने वाली एजेंसियों (Law Enforcement Agencies) की साफ तौर पर नाकामी करार दिया है. अदालत ने कहा कि रोशनी (लाइटिंग) की कमी, खराब निगरानी (Surveillance) और अन्य प्रशासनिक सुविधाओं के अभाव के कारण पार्क, बसें और अन्य सार्वजनिक स्थल अत्यधिक जोखिम भरी जगहें बनते जा रहे हैं. इन बुनियादी कमियों के चलते सार्वजनिक जगहों को इस तरह असुरक्षित नहीं बनने दिया जा सकता.
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लेटर पेटिशन और अन्य घटनाएं
इससे पहले, आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह की ओर से वकील सत्यम राजपूत के जरिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को एक लेटर पेटिशन भेजी गई थी, जिसमें इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने की पुरजोर मांग की गई थी. इस पत्र में हाल ही में सामने आई दो प्रमुख घटनाओं का जिक्र किया गया है.
- चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप की घटना.
- मौजपुर के एक डे-केयर या प्ले-स्कूल में तीन साल के मासूम बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न की घटना.
लेटर पेटिशन में सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई थी कि वह दिल्ली सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, दिल्ली पुलिस, उत्तर प्रदेश पुलिस और अन्य संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को नोटिस जारी कर इन मामलों की निष्पक्ष जांच और उन पर की गई अब तक की कार्रवाई की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट तलब करे.
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