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Science News: महासागर में छुपा टाइम बम! समुद्री डकार से बदल जाएगी जलवायु, वैज्ञानिकों की चेतावनी

Science News: अंटार्कटिका को घेरने वाला दक्षिणी महासागर लंबे समय से इंसानों द्वारा पैदा की जा रही गर्मी और कार्बन को अपने अंदर स्टार करके बैठा है. इसको लेकर वैज्ञानिकों का मानना है कि इस गर्मी को महासागर कभी भी बाहर उगल सकता है.

Science News: अंटार्कटिका को घेरने वाला दक्षिणी महासागर लंबे समय से इंसानों द्वारा पैदा की जा रही गर्मी और कार्बन को अपने अंदर स्टार करके बैठा है. इसको लेकर वैज्ञानिकों का मानना है कि इस गर्मी को महासागर कभी भी बाहर उगल सकता है, जिससे क्लाइमेट रिकवरी में दिक्कत आ जाएगी.

दक्षिणी महासागर पिछले सौ वर्षों से पृथ्वी को जलवायु संकट से बचा़ रहा है. लेकिन अब इसको लेकर वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जैसे ज्यादा खा-पी लेने पर डकार लेकर गैस निकाल जाती है, वैसे ही यह महासागर भी एक झटके में गर्मी और कार्बन बाहर छोड़ सकता है. अगर ऐसा हुआ, तो आने वाले सौ साल तक इसका असर रहेगा.

धरती पर मौसम के बदलाव में ज्यादा समय नहीं लगता. यहां आज गर्मी है तो कल ठंड लगने लगती है, लेकिन समुद्र की दुनिया बहुत बड़ी और धीमी है. वहां पर देर से बदलाव होता है, लेकिन जब होता है तो लंबे समय तक वैसा ही रहता है. आपको बता दें कि दक्षिणी महासागर में अब गर्मी नीचे की ओर जमा हो रही है, समुद्र की धाराएं बदल चुकी है. पहले जहां ठंडी हवाएं ऊपर की ओर आती थी, अब गर्मी के गहराई में स्टोर होने के कारण एक बड़ा हॉट बबल बन रहा है, जो एक चिंता का विषय है.

मानव गतिविधियों से पैदा हो रही गर्मी को महासागर लगातार अपने अंदर स्टोर कर रहा है. जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक मॉडल तैयार किया है, जिसमें समुद्र की गहराई, समुद्री बर्फ, बारिश, हवा की गर्मी और नमी के साथ पेड़ों की भूमिका को शामिल किया गया. इस मॉडल से अंदाजा लगाया गया है कि अगर अगले 70 वर्षो तक कार्बन बढ़ता रहा और फॉसिल फ्यूल अचानक घटते रहे, तो तापमान में गिरावट देखने को मिलेगी.

इस मॉडल के अनुसार, जब महासागर अचानक गर्मी बाहर निकालेगा, तो पृथ्वी का तापमान तुरंत बढ़ जाएगा. यह बदलाव औद्योगिक काल की गर्मी जितना खतरनाक होगा, जिसका असर 100 साल से भी अधिक समय तक रह सकता है.

इस मॉडल के मुताबिक, समुद्र के इस डकार का असर हर जगह एक जैसा नहीं होगा, लेकिन दक्षिणी गोलार्ध पर इसका प्रभाव सबसे ज्यादा होगा. यहां के ज्यादातर क्षेत्रों में पहले से ही सूखा, तूफान और खाने का संकट मंडराया हुआ है. ऐसे में अगर यहां के तापमान में और वृद्धि घातक परिणाम ला सकती है. क्लाइमेट संकट में ग्लोबल साउथ पहले से ही सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है.

जलवायु को लेकर लोग यही सोचते हैं, कि जितना कार्बन कम करेंगे, धरती उतनी ठंडी होती जाएगी. पर असलियत इससे जटिल है, क्योंकि महासागर इसके परिणामों के बीच में खड़े हैं. इसलिए आज के नीतियों के परिणाम तुरंत नहीं दिखाई देंगे. यह एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके प्रभाव दशकों बाद स्पष्ट होंगे.

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-भारत एक्सप्रेस



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