Alopi Devi Shakti Peeth temple, Prayagraj
Alopi Devi : सनातन परंपरा में देवी-देवताओं के साकार रूप की पूजा की जाती है और श्रद्धालु उनकी मूर्तियों के समक्ष आराधना करते हैं. प्रयागराज के अलोपी देवी मंदिर की विशेषता यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है, फिर भी रोज हजारों भक्त दर्शन करने और आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं. प्रयागराज के अलोपीबाग स्थित यह शक्तिपीठ श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां मान्यता है कि देवी सती का दाहिना हाथ यहीं आकर अलोप (गायब) हो गया था. इसी कारण इस स्थान का नाम अलोपीशंकरी शक्तिपीठ पड़ा. इस मंदिर में प्रतिमा की जगह लकड़ी के पालने की पूजा होती है, जिसे भक्त दिव्य शक्ति का प्रतीक मानते हैं.
Alopi Devi मंदिर का नाम और उसका अर्थ
अलोपी देवी मंदिर को अलोपशंकरी शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब सती ने यज्ञ की अग्नि में अपने प्राण त्याग दिए तो भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे। दुनिया विनाश से बच सके, इसलिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया और जहां-जहां अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ बने. प्रयागराज के इस स्थान पर देवी का हाथ गिरा और वह तुरंत ही कुंड में विलीन हो गया. इसी अलोप (गायब हो जाने) की वजह से मंदिर का नाम अलोपशंकरी पड़ा.
‘अलोप’ का अर्थ है गायब होना और ‘शंकरी’ शब्द मां पार्वती का पर्याय है. इस प्रकार यह स्थान ‘अलोपीशंकरी’ कहलाया और इस मंदिर को आलोपी देवी मंदिर और महादेवेश्वरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है.
प्रयागराज से जुड़ा महत्व ( Alopi Devi)
मंदिर जिस स्थान पर स्थित है, उस इलाके का नाम भी अलोपीबाग है, जो इसी मंदिर की प्रसिद्धि पर आधारित है. यह शक्तिपीठ संगम तट के पास स्थित है, जहां गंगा, यमुना और सरस्वती नदियों का संगम होता है. संगम नगरी और तीर्थराज के रूप में विख्यात प्रयागराज का उल्लेख रामचरित मानस तक में मिलता है। 15वीं सदी में मुगल शासनकाल में इसका नाम इलाहाबाद कर दिया गया था, जिसे अब पुनः योगी सरकार ने इलाहाबाद से प्रयागराज कर दिया है. प्रयाग का शाब्दिक अर्थ है प्रथम यज्ञ क्योंकि भगवान ब्रह्मा ने यहीं धरती का पहला यज्ञ किया था. प्रयाग में पवित्र नदियां गंगा, यमुना,सरस्वती नदियों का संगम है और मान्यता है कि यहां देवी देवता निवास भी करते हैं.
Alopi Devi मंदिर में दर्शन का समय
अलोपी देवी मंदिर सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक भक्तों के लिए खुला रहता है. श्रद्धालु दिनभर अपनी सुविधा के अनुसार यहां दर्शन कर सकते हैं और देवी से आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं.
मंदिर में मनाए जाने वाले पर्व
शक्तिपीठ होने के कारण नवरात्र पर यहां विशेष भव्यता देखने को मिलती है. नौ दिनों तक देवी के नौ स्वरूपों की पूजा होती है और मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक आयोजन किए जाते हैं. इसके अलावा मंदिर के बाहर हर सोमवार और शुक्रवार को भी मेला लगता है, जिसे माता का मेला कहा जाता है. मंदिर में देवी के झूले की पूजा अर्चना के लिए काफी भीड़ रहती है. नवरात्र पर श्रद्धालुओं की सुबह से ही लम्बी लंबी कतारें लग जाती हैं.
Alopi Devi मंदिर की विशेषताएं
अलोपी देवी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मूर्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि लकड़ी के पालने की आराधना की जाती है. यह पालना मंदिर परिसर के कुंड के ऊपर बने चांदी के चबूतरे पर लटका है. श्रद्धालु यहां रक्षा सूत्र बांधते हैं और विश्वास करते हैं कि जब तक वह बंधा रहेगा, तब तक देवी उनकी रक्षा करती रहेंगी. मान्यता है कि मंदिर के झूले वाले स्थान पर देवी आलोप हो गई और इसीलिए यहां भक्त पूरे मनोभाव से देवी को पूजा करते हैं और उनको झूले में झुलाते भी हैं.
यह अनोखा स्वरूप ही Alopi Devi मंदिर को विशेष बनाता है. श्रद्धा और विश्वास का यह केंद्र न केवल प्रयागराज बल्कि पूरे देश में अपनी अद्वितीय परंपरा और आस्था के लिए प्रसिद्ध है.
भारत एक्सप्रेस
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