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Navratri Special: कानपुर के बाराहदेवी, जंगली देवी और कुष्मांडा देवी मंदिरों की क्या है मान्यता? नवरात्रि के दिनों में लगती है श्रद्धालुओं की भीड़

नवरात्रि 2025 पर कानपुर के तीन प्राचीन मंदिरों में उमड़ती है भक्तों की भीड़.कानपुर की इन तीन देवियों के दर्शन न हो तो नवरात्र अधूरा सा लगता है.

Navratri special Kanpur temples

Navratri special Kanpur temples: शारदीय नवरात्र 22 सितंबर से प्रारंभ हो रहे हैं. ऐसे में कानपुर की इन तीन देवियों के दर्शन न हो तो मानों नवरात्र अधूरा सा लगता है. इन तीन देवियों में से एक देवी शक्तिपीठ भी हैं. बाराहदेवी मंदिर, जंगली देवी मंदिर और कुष्मांडा देवी मंदिर में भक्तों की सुविधा और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जा रहा है और साथ ही साफ़-सफ़ाई से लेकर दर्शन की विशेष व्यवस्था की गई है.

जूही बारा देवी मंदिर: लगभग 1700 वर्ष का यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं बल्कि चमत्कारिक गाथाओं से जुड़ा हुआ स्थान भी है. यह चमत्कारिक मंदिर बारा देवी नाम से प्रसिद्ध है, जिसके पीछे एक अनोखी कथा जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि पिता से अनबन के बाद 12 बहनें घर छोड़कर यहां आकर रहने लगी थीं और बाद में वे पत्थर की मूर्तियों में बदल गई इतना ही नहीं उनके श्राप से उनके पिता भी पत्थर के हो गए. तभी से यह स्थान देवी की पूजा का केंद्र बन गया और इलाके का नाम भी बारा देवी पड़ गया. मंदिर की विशेषता यह है कि यहां भक्त अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए चुनरी बांधते हैं और पूरी होने पर मां का शृंगार कराते हैं. प्रतिदिन यहां एक लाख से अधिक लोग दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

मां बारा देवी मंदिर की पहचान केवल आस्था से ही नहीं, बल्कि इसकी परंपराओं और मेले से भी है. पहले नवरात्र के समय यहां श्रद्धालु अपनी भक्ति दिखाने के लिए कठिन और खतरनाक तरीके अपनाते थे जैसे-कोई अपनी जीभ काटकर चढ़ाता था तो कोई नुकीली धातु मुंह से आर-पार कर मंदिर जाता था परंतु प्रशासन की सख्ती के बाद इन प्रथाओं पर रोक लगा दी गई है. मंदिर में प्रवेश के लिए चार मुख्य द्वार हैं-पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण जिनमें से अधिकांश भक्त पूर्व द्वार से प्रवेश करते हैं. नवरात्र पर यहां भव्य मेले का आयोजन भी होता है, जिसमें बच्चों से लेकर हर वर्ग के लिए दुकानें, झूले और मनोरंजन के साधन लगाए जाते हैं. आसपास के जिलों से लेकर देशभर से श्रद्धालु इस दौरान यहां आते हैं और मां बारा देवी के दर्शन करते हैं.

किदवई नगर जंगली देवी मंदिर: कानपुर स्थित यह मंदिर करीब 1400 वर्ष पुराना माना जाता है और इसका इतिहास अभिलेखों में भी दर्ज है. कहा जाता है कि मो. बकर नामक व्यक्ति के मकान की नींव की खुदाई के दौरान ताम्रपत्र मिला था, जिस पर उर्दू भाषा में लेख अंकित था. इस मकान में लगा नीम के पेड़ की खोह में मां की प्रतिमा विराजमान थी. वर्ष 1979 में आए तूफान के दौरान जब नीम का पेड़ गिर गया, तब स्थानीय लोगों ने चंदा इकट्ठा करके यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया तभी से यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगातार बढ़ता गया और पिछले 45 वर्षों से यहां अखंड ज्योति प्रज्वलित है.

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता मां की प्रतिमा है, जो दिन में तीन बार अपना स्वरूप बदलती है. शयन आरती के समय मां का चेहरा मुस्कुराता हुआ नजर आता है, जिसे भक्त बेहद शुभ मानते हैं. मां की प्रतिमा 2.45 कुंतल चांदी के सिंहासन पर विराजमान है, जो श्रद्धा और वैभव का प्रतीक है. मान्यता है कि मां को ईंट चढ़ाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, इसलिए भक्त अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए यहां ईंट चढ़ाते हैं.मंदिर का सौंदर्यीकरण भी लगातार किया जा रहा है और वर्तमान में प्रवेश द्वार को और भव्य बनाने का काम चल रहा है.

घाटमपुर, कुष्मांडा देवी मंदिर: कानपुर का यह प्राचीन मंदिर लगभग एक हजार साल पुराने है जहां सालों से अखंड ज्योति जल रही है. इतिहासकार मानते हैं कि 1380 में राजा घाटमपुर दर्शन ने इस मंदिर की पहली बार नींव रखी थी जिसके कारण नगर का नाम घाटमपुर पड़ा. बाद में 1890 में व्यापारी चंदीदीन भुर्जी ने इसका भव्य निर्माण करवाया, जो मराठा शैली की झलक पेश करता है. यहां स्थापित मूर्तियां दूसरी से दसवीं शताब्दी के बीच की मानी जाती हैं, जो इस मंदिर को और भी ऐतिहासिक बनाती हैं. भदरस गांव के कवि उम्मेदराय खरे ने 1783 में फारसी भाषा में लिखी अपनी पांडुलिपि ‘ऐश आफ्जा’ में माता कुष्मांडा और माता भद्रकाली का उल्लेख किया है. मान्यता है कि लगभग हजार साल पहले कुड़हा नाम का ग्वाला यहां गाय चराता था, जिसकी गाय रोज़ एक स्थान पर दूध गिरा देती थी. जब उस स्थान की खुदाई की गई तो वहां मां कुष्मांडा की पिंडी स्वरूप प्रतिमा प्रकट हुई, जिस कारण उन्हें कुड़हा देवी भी कहा जाता है.

कहा जाता है कि मां की पिंडी पर चढ़ाया गया जल यदि आंखों में लगाया जाए तो कई तरह के रोग दूर हो जाते हैं. यहां माता पिंडी रूप में विराजित हैं और लेटी मुद्रा में प्रतीत होती हैं. मंदिर में सालों से अखंड ज्योति प्रज्वलित है और नवरात्रि के दौरान यहां का माहौल भक्ति और उल्लास से भर जाता है. इस बार भी तैयारियां जोरों पर हैं. तालाब की सफाई से लेकर दुकानों की सजावट तक सब काम तेजी से हो रहा है. पालिका प्रशासन ने पुरुष और महिलाओं के लिए अलग-अलग दर्शन व्यवस्था बनाने के लिए बेरिकेडिंग की योजना बनाई है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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