वाराणसी के लोलार्क कुंड में लोलार्क षष्ठी: पुत्र प्राप्ति की कामना में लाखों का स्नान
Varanasi’s Lolark Kund: काशी में मौजूद लोलार्क कुंड में क्या आपने भी कभी पवित्र डुबकी लगाई है? यहां लोलार्क षष्ठी के महापर्व के दौरान लाखों निसंतान दंपत्तियों ने पुत्र रत्न प्राप्ति की कामना के साथ स्नान किया. यह 36 घंटे का पर्व शुक्रवार दोपहर तक चला, जिसमें लगभग 4 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने भाग लिया.
जन-समाज में मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होती है. भारत एक्सप्रेस न्यूज नेटवर्क के रिपोर्टर बिमलेंद्र राय ने लोलार्क षष्ठी के महापर्व के दौरान यहां आए श्रद्धालुओं से बातचीत की. उन्होंने कहा कि यहां लोलार्क कुंड (Lolark Kund) में स्नान के लिए भक्तों की 4 किलोमीटर लंबी कतारें देखी गईं. बहुत-से श्रद्धालु स्नान के बाद बाबा लोलार्क का दर्शन कर प्रस्थान करते हैं. कामना पूर्ति पर अगले वर्ष धन्यवाद देने भी आते हैं.
श्रद्धालुओं का जमावड़ा, पुलिस मुस्तैद रही
वाराणसी पुलिस ने भारी सुरक्षा व्यवस्था की, जिसमें 36 घंटे का रूट डायवर्शन शामिल था. आईपीएस अधिकारियों की टीम, जिसमें डीसीपी काशी जोन गौरव बांसवाल शामिल थे, लगातार मॉनिटरिंग करती रही. गौरव बांसवाल ने बताया कि 6 लाख से अधिक भक्तों की संभावना को देखते हुए सभी इंतजाम किए गए. अधीनस्थों के साथ वे देर रात से कुंड पर तैनात थे, ताकि श्रद्धालु आसानी से स्नान कर सकें. पंडित ऋषि द्विवेदी ने शास्त्रों का हवाला देते हुए कहा कि यह पर्व क्षत्रपद मास की शुक्ल षष्ठी पर विशेष महत्व रखता है.

लोलार्क आदित्य को समर्पित है यह कुंड
शास्त्रों के अनुसार, लोलार्क कुंड सूर्य देव (लोलार्क आदित्य) को समर्पित है. यहां स्नान से न केवल पुत्र प्राप्ति होती है, बल्कि स्वास्थ्य और समृद्धि की भी प्राप्ति मानी जाती है. प्राचीन काशी खंड में इसका उल्लेख है, जहां गाहड़वाल राजाओं द्वारा यहां पूजा और दान किए जाते थे. कुंड गंगा और असि नदी के संगम पर स्थित माना जाता था, जो अब तुलसी घाट के निकट है.
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काशी के प्राचीन पवित्र स्थलों में गिनती
लोलार्क कुंड (Lolark Kund) काशी के सबसे प्राचीन पवित्र स्थलों में से एक है, जो 15 मीटर गहरा आयताकार टैंक है. ‘लोलार्क’ का अर्थ ‘कांपता सूर्य’ है, जो सूर्य देव की एक अवतार को दर्शाता है. यह स्थल सूर्य और नाग पूजा का प्राचीन केंद्र रहा, जहां विष्णु और शिव की पूजा से पहले सूर्य पूजा होती थी.

18वीं शताब्दी में कराया गया पुनर्निर्माण
कुछ दस्तावेजों के अनुसार, 18वीं शताब्दी में नटोर की रानी भबानी द्वारा इसका पुनर्निर्माण कराया गया. लोलार्क षष्ठी पर सूर्योदय के समय स्नान विशेष फलदायी माना जाता है. इतिहासकारों के अनुसार, यह कुंड 50 फीट गहरा है और शिव तथा सूर्य देव दोनों की कृपा से आशीर्वाद देता है.
यहां लोलार्क षष्ठी पर लगता है बड़ा मेला
लोलार्क षष्ठी का पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि वाराणसी की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवंत रखता है. इस अवसर पर श्रद्धालुओं द्वारा पुलिस प्रशासन की सराहना की गई कि बिना किसी व्यवधान के इतना बड़ा आयोजन कैसे संपन्न हुआ.

इनपुट: Bimalendra Rai, Varanasi
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