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Language and culture

भारत जैसे बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में एकता की सबसे मजबूत कड़ी भाषा और संस्कृति का सकारात्मक संवाद है. आज जब कुछ राष्ट्र-विरोधी तत्त्व राजनीतिक लाभ के लिए हिंदी विरोध को दक्षिण भारत में फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, तब क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देते हुए हिंदी को सेतु भाषा के रूप में मजबूत करने की आवश्यकता और बढ़ गई है.

भारत में आज 'आत्मनिर्भरता' और 'लोकल के लिए वोकल' जैसे नारे खूब सुनाई देते हैं. लेकिन क्या सिर्फ आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी ही काफी है? क्या हमारी सोच, हमारा ज्ञान और दुनिया को देखने का तरीका भी पूरी तरह आज़ाद हो पाया है? इसी बड़े और असहज सवाल को सामने लाती है अभय कुमार दुबे की नई किताब ‘उपनिवेशवाद का अलौकिक साम्राज्य’.