भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता है. देश के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाएं, वहां का साहित्य, लोक परंपराएं और संस्कृति मिलकर भारत की पहचान बनाते हैं. ऐसे में जरूरत इस बात की है कि अलग-अलग भाषाई समुदायों के बीच संवाद और समझ लगातार मजबूत होती रहे. इसी दिशा में दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में हिंदी माध्यम से साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र खोलने का सुझाव महत्वपूर्ण हो सकता है.
भाषा को लेकर देश में अक्सर बहस और राजनीति होती रही है. खासकर दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर समय-समय पर विरोध के स्वर भी सुनाई देते हैं. ऐसे माहौल में हिंदी को किसी दूसरी भाषा के विकल्प के तौर पर पेश करने के बजाय संपर्क और संवाद की भाषा के रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत है. साथ ही यह भी साफ होना चाहिए कि हिंदी को बढ़ावा देने का मतलब क्षेत्रीय भाषाओं को पीछे करना नहीं है.
हिंदी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान भी जरूरी
भारत में हिंदी का व्यापक इस्तेमाल होता है, लेकिन देश की दूसरी भाषाओं का अपना समृद्ध इतिहास और साहित्य है. इसलिए हिंदी को आगे बढ़ाने की कोशिश तभी सफल होगी, जब इसके साथ तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, मराठी, असमिया और दूसरी भारतीय भाषाओं को भी बराबर सम्मान दिया जाए.
हिंदी को संपर्क भाषा मानने और हिंदी साहित्य को सबसे श्रेष्ठ मानने में फर्क है. इन दोनों बातों को एक नहीं समझना चाहिए. हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी दूसरी भारतीय भाषाओं के अध्ययन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए दक्षिण भारत की किसी एक भाषा को हिंदी भाषी राज्यों के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाने की पहल की जा सकती है. इससे लोगों को दूसरे राज्यों की भाषा और संस्कृति को करीब से समझने का मौका मिलेगा.
विश्वविद्यालयों में क्षेत्रीय साहित्य पर हो शोध
जहां-जहां हिंदी की पढ़ाई होती है, वहां स्थानीय भाषा और साहित्य को हिंदी के माध्यम से समझने और उस पर शोध करने की व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है. पश्चिम बंगाल में बांग्ला साहित्य, महाराष्ट्र में मराठी साहित्य, कर्नाटक में कन्नड़ साहित्य और केरल में मलयालम साहित्य पर हिंदी माध्यम से शोध को प्रोत्साहित किया जा सकता है.
इसका फायदा दो तरफा होगा. एक ओर हिंदी के विद्यार्थियों को देश के अलग-अलग हिस्सों के साहित्य और विचारों को समझने का अवसर मिलेगा, वहीं क्षेत्रीय साहित्य की पहुंच भी व्यापक होगी. भारतीय अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन भी हिंदी माध्यम से कराया जा सकता है, ताकि हिंदी भाषी विद्यार्थियों को देश में लिखे जा रहे अंग्रेजी साहित्य की बेहतर समझ मिल सके.
भाषाई संवाद सिर्फ संस्थानों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. जो हिंदी भाषी लोग दूसरे राज्यों में रहते हैं, उन्हें भी स्थानीय भाषा सीखने और रोजमर्रा के कामकाज में उसका इस्तेमाल करने की कोशिश करनी चाहिए. इसी तरह दूसरे राज्यों के लोगों के लिए भी हिंदी सीखना आपसी संवाद को आसान बना सकता है.
दरअसल, भाषा सीखना केवल शब्दों को समझना नहीं होता. इसके जरिए हम उस समाज की सोच, परंपराओं और संस्कृति को भी बेहतर तरीके से जान पाते हैं.
दक्षिण और पूर्वोत्तर में बनें विशेष केंद्र
दक्षिण और पूर्वोत्तर राज्यों में ऐसे साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं, जहां क्षेत्रीय भाषाओं, साहित्य, इतिहास और संस्कृति का अध्ययन हिंदी माध्यम से हो. इन केंद्रों का उद्देश्य किसी भाषा को दूसरी भाषा पर थोपना नहीं, बल्कि अलग-अलग भाषाई समाजों के बीच पुल तैयार करना होना चाहिए.
अगर ऐसे संस्थान सही सोच और व्यापक दृष्टिकोण के साथ काम करते हैं, तो छात्रों, शोधकर्ताओं और आम लोगों को देश की विविध भाषाओं और संस्कृतियों को समझने का बेहतर अवसर मिलेगा. इससे भाषाओं के बीच दूरी कम हो सकती है और एक-दूसरे को लेकर बनी गलतफहमियां भी दूर हो सकती हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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