इंसानों के बालों से इथेनॉल बनाने का दावा कितना सच?
Ethanol From Hair: क्या आपने कभी सोचा है कि सैलून में कटकर कूड़ेदान में फेंके जाने वाले बाल कभी आपकी गाड़ी की पेट्रोल टंकी तक पहुँच सकते हैं? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लग सकता है, लेकिन गुजरात के एक स्टार्टअप ने ऐसा दावा किया है जो आपको हैरान कर देगा. कंपनी का कहना है कि उसने इंसानों के बालों से इथेनॉल (फ्यूल) बनाने की अनोखी तकनीक विकसित कर ली है. आइए जानते हैं कि इस अनोखे दावे की असलियत क्या है और इसके पीछे की पूरी कहानी क्या है.
क्या है पूरा मामला और स्टार्टअप का दावा?
गुजरात की कंपनी ‘टेक्नोफेस्ट ग्लोबल’ ने ‘बायोमेकरज़’ के साथ मिलकर इस तकनीक को तैयार किया है. कंपनी ने इसे ‘5G SAFE’ नाम दिया है और इसके लिए ‘IMPHA’ (इन-वाइट्रो मेटाबॉलिक-इंजीनियर्ड पाथवे फॉर हेयर टू अल्कोहल) नाम की पेटेंट तकनीक का इस्तेमाल करने की बात कही है. कंपनी का दावा है कि उसने करीब 100 लीटर क्षमता वाले रिसर्च प्लांट में इसका सफल परीक्षण भी कर लिया है.
अब तक भारत में पेट्रोल की मांग पूरी करने के लिए गन्ने और अनाज से इथेनॉल बनाया जाता है, ताकि इसे पेट्रोल में मिलाया जा सके. लेकिन अगर बालों से इथेनॉल बनने की यह तकनीक सच साबित होती है, तो इसके लिए अलग से खेती या उपजाऊ जमीन की जरूरत नहीं पड़ेगी.
बालों से इथेनॉल बनाना कितना आसान है?
विशेषज्ञों के मुताबिक इंसानों के बालों से फ्यूल बनाना इतना भी आसान नहीं है. बालों में ‘केराटिन’ नाम का एक बहुत मजबूत प्रोटीन होता है. गन्ने या मक्के की तरह इन्हें आसानी से सड़ाकर या फर्मेंट करके अल्कोहल में बदलना एक बड़ी चुनौती है. केराटिन टूटने पर अमीनो एसिड बनता है, जिसे सीधे फ्यूल में बदलना पारंपरिक तरीकों से संभव नहीं होता.
यही वजह है कि इस दावे पर सवाल भी उठ रहे हैं. कंपनी ने अभी तक यह साफ नहीं किया है कि एक किलो बालों से असल में कितना इथेनॉल बनता है, इसकी लागत कितनी आएगी, और क्या यह पेट्रोल में मिलाने के मानकों पर खरा उतरता है या नहीं.
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असल जिंदगी में क्या हैं चुनौतियां?
भले ही यह सुनने में बहुत दिलचस्प लगे, लेकिन इसे जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा. देश भर के हजारों सैलून और नाइयों की दुकानों से बाल इकट्ठा करना, उनमें लगे तेल, शैम्पू और डाई को साफ करना और फिर उन्हें फैक्ट्रियों तक पहुँचाना एक बहुत बड़ा झंझट भरा काम है. इसके अलावा, सिर्फ 100 लीटर के छोटे प्लांट में टेस्टिंग सफल होने का यह मतलब नहीं है कि कमर्शियल लेवल पर बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन किया जा सके.
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