Dussehra 2026: देश भर में दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है और जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जाते हैं. लेकिन दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा का बिसरख गांव इस मामले में देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है. यहां रावण का दहन करने की बजाय उसकी पूजा की जाती है.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बिसरख को रावण की जन्मस्थली माना जाता है, यही वजह है कि गांव के लोग उन्हें अपना पूर्वज मानकर सम्मान देते हैं. इस बार दशहरे के मौके पर यहां के प्राचीन शिव मंदिर में रावण की एक भव्य प्रतिमा भी स्थापित की गई है, जिससे इस स्थान का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है.
क्यों नहीं जलता बिसरख में रावण का पुतला?
आज भले ही बिसरख आधुनिक सोसाइटियों और ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच घिर चुका हो, लेकिन इसकी जड़ें सदियों पुरानी पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी हुई हैं. स्थानीय लोगों का विश्वास है कि रावण का जन्म इसी पावन भूमि पर हुआ था. यही कारण है कि यहां कभी रावण का पुतला नहीं जलाया जाता. गांव वालों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति अपने पूर्वज के प्रति आदर भाव रखता है, तो वह उनका दहन करने की सोच भी नहीं सकता. रावण को सिर्फ एक पौराणिक खलनायक के रूप में देखने के बजाय ग्रामीण उन्हें अपने कुल और परिवार का हिस्सा मानते हैं.
शिव मंदिर में विशेष हवन और अनुष्ठान
बिसरख का प्राचीन शिव मंदिर इस पूरी आस्था का मुख्य केंद्र है. ऐसी मान्यता है कि रावण और उनके पिता ऋषि विश्रवा ने इसी स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. इस बार मंदिर परिसर में स्थापित की गई रावण की नई प्रतिमा को फूलों से बेहद खूबसूरती से सजाया गया है. दशहरे के पावन पर्व पर मंदिर में विशेष पूजा-पाठ और हवन का आयोजन किया जाएगा. सुबह और शाम होने वाली नियमित आरती के अलावा इस दिन यहां भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे जो एक तरफ जहां भगवान शिव के दर्शन करेंगे, वहीं रावण की पूजा में भी शामिल होकर अपनी अनूठी परंपरा का निर्वहन देखेंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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