नोएडा स्थित एमिटी यूनिवर्सिटी में आज नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की नई पुस्तक ‘करुणा: समाधान की शक्ति’ के लोकार्पण एवं पुस्तक परिचर्चा कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया. इस अवसर पर ‘भारत एक्सप्रेस’ के संवाददाता मुचकुंद राय ने नोबेल विजेता कैलाश सत्यार्थी से उनकी पुस्तक, वैश्विक संकट और नई पीढ़ी (Gen-Z) की भूमिका को लेकर खास बातचीत की.
‘करुणा शब्द हजारों साल से सुना गया, लेकिन अमल में नहीं आया’
सवाल: आपकी पुस्तक ‘करुणा: समाधान की शक्ति’ का विमोचन हुआ है. करुणा के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे और इस पुस्तक को लिखने का विचार आपके मन में कैसे आया?
कैलाश सत्यार्थी: “करुणा शब्द हजारों साल से लोग सुन रहे हैं, लेकिन अमल में नहीं ला रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग सामान्य तौर पर करुणा को केवल एक भाव, दया, कृपा, परोपकार या सामाजिक मूल्य जैसी चीज मानते हैं. बेशक ये सब अच्छे सामाजिक मूल्य और अच्छे भाव हैं, लेकिन करुणा केवल भाव नहीं, बल्कि एक अंतर्निहित शक्ति (Inherent Power) है. यह हम सबके अंदर मौजूद वह शक्ति है जो अपनी और दूसरों की समस्याओं का विवेकपूर्ण समाधान कराती है.”
उन्होंने आगे कहा—
“आज हमारी दुनिया जल रही है. मानवता और हमारी धरती मां—दोनों खतरे में हैं. पूरे संसार में उग्रता, हिंसा और घृणा बढ़ रही है, जबकि नैतिक जवाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी घट रही है. ऐसे संकट के समय में यह बेहद जरूरी हो गया है कि हम दूसरे की तकलीफ को अपनी तरह महसूस करें और उसे दूर करने व उसका निवारण करने का पूरा प्रयास करें. करुणा उसी प्रयास का नाम है.”
सवाल: आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
कैलाश सत्यार्थी: “युवाओं के भीतर अभी जो ऊर्जा है, जो ईमानदारी है और जो पूरी नई पीढ़ी (Gen-Z) में साफ नजर आती है, मुझे उस पर पूरा भरोसा है. जब यह नई पीढ़ी हिंसा से दूर रहकर समाज परिवर्तन, अन्याय, अत्याचार, पाखंड और अव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाती है और लड़ती है, तो उसमें जो नैतिक शक्ति होती है, वह हमारी पीढ़ी के लोगों से कहीं ज्यादा है.”
उन्होंने आगे संदेश देते हुए कहा—
“हमारी पीढ़ी के लोगों को अब यह समझना चाहिए कि वर्तमान और भविष्य दोनों ही यह नई पीढ़ी है. हमें उनके लिए जगह खाली करनी चाहिए ताकि वे पूरी दुनिया और भविष्य का कुशल नेतृत्व कर सकें.”
दिग्गज शख्सियतों की मौजूदगी में हुआ पुस्तक का लोकार्पण
एमिटी यूनिवर्सिटी के एफ-2 ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ‘सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कम्पैशन’ और ‘एमिटी यूनिवर्सिटी’ द्वारा हार्पर कॉलिंस एवं कुंजुम बुक्स के सहयोग से किया गया. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राज्यसभा के माननीय उप-सभापति श्री हरिवंश मौजूद रहे. इसके अलावा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रख्यात लेखक व चिंतक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल, लेखक व आलोचक वेद प्रकाश, तथा प्रसिद्ध लेखक व कला समीक्षक सुश्री रक्षंदा जलील शामिल हुईं. पुस्तक परिचर्चा का सफल संचालन वरिष्ठ पत्रकार संकेत उपाध्याय द्वारा किया गया.
कैलाश सत्यार्थी: बचपन बचाने और वैश्विक करुणा के पुरोधा
कैलाश सत्यार्थी भारत की उन शख्सियतों में शामिल हैं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन शोषित, पीड़ित और बाल श्रम की बेड़ियों में जकड़े बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया. वर्ष 2014 में उन्हें बाल अधिकारों की रक्षा और शांति स्थापना के लिए विश्व के सर्वोच्च ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था.
‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के जरिए उन्होंने अब तक एक लाख से अधिक बच्चों को बाल मजदूरी, गुलामी और तस्करी के चंगुल से मुक्त कराकर शिक्षा और सम्मान की मुख्यधारा से जोड़ा है. वर्तमान में वे अपने संगठन ‘सत्यार्थी मूवमेंट फॉर ग्लोबल कम्पैशन’ के जरिए पूरी दुनिया में ‘करुणा के वैश्वीकरण’ (Globalising Compassion) का अलख जगा रहे हैं, ताकि हर बच्चे के लिए एक सुरक्षित, शिक्षित और समतामूलक समाज का निर्माण हो सके.
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