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2400 साल पुराना शाप या सिर्फ लोककथा? जानिए प्रयागराज के इस गांव की अनसुनी दास्तान

प्रयागराज के यमुनापार इलाके में स्थित भीटा गांव अपनी 2400 साल पुरानी लोककथा और रहस्यमयी मान्यता के लिए चर्चा में है.

रिपोर्ट- अनम फातिमा, प्रयागराज


प्रयागराज का नाम आते ही संगम, कुंभ और ऐतिहासिक धरोहरों की तस्वीर आंखों के सामने उभरती है. लेकिन इसी शहर के यमुनापार इलाके में एक ऐसा गांव भी है, जिसके बारे में सुनकर आज भी लोग ठिठक जाते हैं. यह गांव है भीटा, जहां सदियों पुरानी एक लोक-मान्यता आज भी लोगों की बातचीत का हिस्सा बनी हुई है.

कहा जाता है कि यह गांव यदुवंशी यानी यादव समाज के लिए किसी श्राप से जुड़ा हुआ है. मान्यता इतनी गहरी है कि शाम ढलने के बाद यादव समाज के लोग यहां रात बिताने से बचते हैं. स्थानीय लोगों के बीच यह धारणा पीढ़ियों से चली आ रही है कि अगर कोई यादव यहां रात में रुक गया, तो उसके साथ अनहोनी हो सकती है.

कहानी राजा उदयन के दौर की बताई जाती है

भीटा से जुड़ी कहानी करीब 2400 साल पुरानी बताई जाती है. स्थानीय किंवदंती इसे राजा उदयन के समय से जोड़ती है. गांव में मौजूद प्राचीन टीले और किले के अवशेष भी इस जगह के पुराने इतिहास की ओर इशारा करते हैं.

लोककथा के मुताबिक, उस दौर में यहां एक बेहद विशाल अजगर रहता था. कहा जाता है कि वह रोज यमुना नदी में पानी पीने जाता था. एक दिन एक यदुवंशी व्यक्ति भी सुबह-सुबह नदी की तरफ गया. अंधेरे और जल्दबाजी में वह गलती से उस विशाल अजगर के ऊपर जा बैठा.

जब उसे पता चला कि जिस चीज को वह कोई सामान्य वस्तु समझ रहा था, वह असल में अजगर है, तो उसके होश उड़ गए. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. मान्यता है कि अजगर ने अपना रूप बदल लिया और उस व्यक्ति से कहा कि वह जो चाहे, मांग सकता है.

उस व्यक्ति ने धन-संपत्ति की इच्छा जताई. उसे कथित तौर पर वरदान मिल गया, लेकिन साथ ही एक शर्त भी रखी गई कि वह इस रहस्य के बारे में किसी को नहीं बताएगा.

कहानी के मुताबिक, वह व्यक्ति यह बात अपनी पत्नी से कह बैठा. इसके बाद घटनाओं का सिलसिला ऐसा चला कि कई लोगों की मौत होने लगी. इसी घटना को आगे चलकर यदुवंशी समाज पर पड़े कथित श्राप से जोड़ दिया गया.

शाम होते ही क्यों बदल जाता है लोगों का व्यवहार?

आज भी भीटा के आसपास रहने वाले कई लोग इस कहानी को जानते हैं. गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि उन्होंने बचपन से अपने परिवारों में यह बात सुनी है कि यादव समाज के लोगों को रात में गांव की सीमा के भीतर नहीं रुकना चाहिए.

यह बात सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं है. स्थानीय युवाओं और राहगीरों में भी इस मान्यता की चर्चा सुनने को मिलती है. कुछ लोगों का कहना है कि भले ही आज जमाना बदल गया हो, लेकिन पुरानी परंपरा को तोड़ने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता.

यानी मामला सिर्फ डर का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सामाजिक स्मृति का भी है. जब कोई कहानी लगातार दादा से पिता और पिता से बेटे तक पहुंचती है, तो समय के साथ वह स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बन जाती है.

365 बीघे में फैले पुराने किले के अवशेष

भीटा की पहचान केवल इस रहस्यमयी कहानी से नहीं है. यहां प्राचीन पुरातात्विक अवशेष भी मौजूद हैं. स्थानीय विवरणों में करीब 365 बीघे में फैले एक पुराने किले का जिक्र मिलता है, जिसे राजा उदयन से जोड़ा जाता है.

आज यह किला अपनी पुरानी भव्यता खो चुका है और उसके बड़े हिस्से खंडहर में बदल चुके हैं. आसपास के प्राचीन टीले और अवशेष इस इलाके के लंबे इतिहास की कहानी कहते हैं.

दिन के समय यहां का माहौल सामान्य नजर आता है. लेकिन शाम होते ही वही जगह स्थानीय लोककथाओं के कारण अलग ही एहसास देने लगती है. यही वजह है कि भीटा की चर्चा सिर्फ इतिहास या पुरातत्व के संदर्भ में नहीं, बल्कि रहस्य और लोकविश्वास के तौर पर भी होती है.

अब सवाल यह है कि क्या सचमुच 2400 साल पुराना कोई श्राप आज भी असर डाल सकता है?

वैज्ञानिक नजरिए से ऐसी घटना के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि किसी खास समुदाय के व्यक्ति के लिए गांव में रात बिताना जानलेवा है. इस लिहाज से श्राप की कहानी को प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि स्थानीय लोककथा और मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

लेकिन दूसरी तरफ, किसी इलाके में सदियों से चली आ रही मान्यताओं को सिर्फ एक वाक्य में खारिज कर देना भी पूरी तस्वीर नहीं बताता. इन कहानियों में उस जगह का इतिहास, लोगों की सामूहिक यादें और कई पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं जुड़ी होती हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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