मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
UP News: उत्तर प्रदेश में जातिगत भेदभाव खत्म करने के लिए योगी सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य सरकार ने आदेश जारी किया है कि अब सार्वजनिक स्थानों, पुलिस रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों में किसी भी व्यक्ति के नाम के साथ उसकी जाति का उल्लेख नहीं किया जाएगा. इतना ही नहीं, जाति आधारित रैलियों और नारेबाजी पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है.
पिछले साल अप्रैल में दायर एक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पुलिस दस्तावेजों और FIR में अभियुक्त, गवाह या शिकायतकर्ता की जाति लिखना संविधान की भावना के खिलाफ है. अदालत ने यह भी कहा था कि आधुनिक समय में पहचान के लिए तकनीकी साधन मौजूद हैं, इसलिए जाति का उल्लेख करना सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देता है.
हाईकोर्ट ने अपने 28 पन्नों के आदेश में सरकार और पुलिस को निर्देश दिया था कि थानों के नोटिस बोर्ड, साइन बोर्ड और वाहनों पर लगे जातीय संकेत तुरंत हटाए जाएं और भविष्य में दोबारा न लगाए जाने के लिए नियम बनाए जाएं. इसके बाद कार्यवाहक मुख्य सचिव दीपक कुमार ने सभी वरिष्ठ अधिकारियों, पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्तों, जिलाधिकारियों और एसएसपी-एसपी को दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं.
अब क्या-क्या बदलेगा?
नए आदेशों के तहत FIR और गिरफ्तारी मेमो में अब आरोपी की जाति नहीं लिखी जाएगी, बल्कि माता-पिता का नाम दर्ज होगा. इसके अलावा थानों के नोटिस बोर्ड और सरकारी वाहनों से जातीय नारे और संकेत हटाए जाएंगे. इंटरनेट मीडिया पर भी जाति आधारित कंटेंट साझा करने पर रोक रहेगी. राज्य में जाति आधारित रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों पर पूर्ण प्रतिबंध लागू होगा.
हालांकि, एससी/एसटी एक्ट जैसे मामलों में, जहां कानूनी तौर पर जाति का उल्लेख आवश्यक है, वहां यह छूट बनी रहेगी. इसके लिए पुलिस नियमावली और मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) में संशोधन किए जाएंगे.
राजनीतिक असर और चुनावी सियासत
यह आदेश उस समय आया है जब राज्य में पंचायत चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं और राजनीतिक दल विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में जुटे हैं. समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जैसे दल, जो लंबे समय से जाति आधारित राजनीति को अपने चुनावी समीकरण का अहम हिस्सा बनाते रहे हैं, इस फैसले से सीधे प्रभावित होंगे.
सपा हाल ही में ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में थी, वहीं बसपा लगातार खुद को दलितों की सबसे बड़ी आवाज बताती रही है. अब दोनों दलों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा.
हाईकोर्ट ने यह भी सुझाव दिया है कि पुलिस फॉर्म में पिता या पति के नाम के साथ-साथ मां का नाम भी दर्ज होना चाहिए, ताकि लैंगिक समानता को बढ़ावा मिले. साथ ही कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को यह भी याद दिलाया कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना अनिवार्य है.
किस मामले से शुरू हुई पहल?
यह पूरा मामला 29 अप्रैल 2023 की एक घटना से जुड़ा है. उस दिन पुलिस ने एक स्कॉर्पियो गाड़ी से अवैध शराब बरामद की थी और तीन लोगों को गिरफ्तार किया था. FIR में आरोपियों की जातियां (माली, पहाड़ी राजपूत, ठाकुर, ब्राह्मण) दर्ज की गई थीं. इस पर याचिका दायर हुई और हाईकोर्ट ने इसे संवैधानिक मूल्यों के विपरीत मानते हुए सरकार को बदलाव के आदेश दिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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