डॉ. कमला सोहनी
1930 के दशक का भारत आज जैसा नहीं था. खासकर महिलाओं की शिक्षा को लेकर सोच काफी सीमित और रूढ़िवादी थी. अधिकतर परिवार मानते थे कि लड़कियों का काम घर संभालना है, पढ़ाई-लिखाई या करियर बनाना उनके लिए जरूरी नहीं. ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की विज्ञान जैसे कठिन और पुरुष-प्रधान क्षेत्र में आगे बढ़ने की कोशिश करे, तो यह अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी.
इसी समय डॉ. कमला सोहनी का नाम सामने आता है. उन्होंने न सिर्फ पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, बल्कि उस सोच को भी चुनौती दी जो महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकती थी.
इंदौर से मुंबई तक का सफर
कमला सोहनी का जन्म 18 जून 1911 के आसपास इंदौर में हुआ था. उनका परिवार पढ़ाई-लिखाई को महत्व देता था, जो उस समय बहुत बड़ी बात थी. इसी माहौल ने उन्हें आगे बढ़ने की हिम्मत दी. उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय (आज का मुंबई विश्वविद्यालय) से बीएससी की पढ़ाई की, जिसमें उनका विषय रसायन विज्ञान था.
खास बात यह रही कि उन्होंने अपनी कक्षा में टॉप किया. उस दौर में किसी महिला का विज्ञान में इस तरह आगे निकलना बेहद असामान्य था.
IISc में एंट्री की जंग
बीएससी के बाद उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में रिसर्च के लिए आवेदन किया. लेकिन वहां उन्हें सीधे तौर पर ठुकरा दिया गया. उस समय संस्थान के निदेशक और नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. सी.वी. रमन का मानना था कि महिलाएं वैज्ञानिक शोध के लिए उपयुक्त नहीं होतीं.
यह फैसला कमला के लिए बहुत बड़ा झटका था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने संस्थान के बाहर बैठकर शांतिपूर्ण विरोध किया. उनके इस साहस और लगातार दबाव के बाद आखिरकार उन्हें कुछ शर्तों के साथ दाखिला मिल गया. हालांकि, ये शर्तें आसान नहीं थीं. उन्हें सामान्य छात्रों जैसी सुविधाएं नहीं मिलीं और कई तरह की पाबंदियों के बीच काम करना पड़ा.
कैम्ब्रिज में ऐतिहासिक उपलब्धि
कमला सोहनी ने हालात से समझौता नहीं किया, बल्कि मेहनत से जवाब दिया. बाद में वे यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज पहुंचीं, जहां उन्होंने बायोकेमिस्ट्री में शोध किया. साल 1939 में उन्होंने पीएचडी पूरी की और इतिहास रच दिया. वे भारत की पहली महिला बनीं जिन्होंने किसी वैज्ञानिक विषय में डॉक्टरेट हासिल की.
उनका शोध पौधों की कोशिकाओं और उनके ऊर्जा सिस्टम पर केंद्रित था, जो उस समय विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विषय माना जाता था.
भारत लौटकर समाज के लिए काम
पीएचडी के बाद वे भारत लौटीं और पोषण तथा खाद्य विज्ञान पर काम किया. उन्होंने देश में कुपोषण जैसी समस्याओं को समझने और उनके समाधान की दिशा में अहम योगदान दिया. आगे चलकर वे मुंबई के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की पहली महिला निदेशक भी बनीं.
28 जून 1998 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. डॉ. कमला सोहनी सिर्फ एक वैज्ञानिक नहीं थीं, बल्कि उस सोच की प्रतीक थीं जिसने यह साबित किया कि योग्यता का कोई लिंग नहीं होता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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