Bharat Express DD Free Dish

‘बुद्ध’ को हथियार बना रहा ड्रैगन! श्रीलंका में पकड़ बनाने के लिए चीन चल रहा शातिराना चाल

श्रीलंका में चीन की ‘बौद्ध कूटनीति’ पर एक नई रिपोर्ट ने खलबली मचा दी है. एक रिपोर्च के अनुसार, चीन सांस्कृतिक आदान-प्रदान और मंदिरों के जीर्णोद्धार की आड़ में श्रीलंका की धार्मिक जड़ों में अपनी कम्युनिस्ट विचारधारा को घुसा रहा है.

China Buddhist Diplomacy in Sri Lanka

ये इमेज एआई द्वारा बनाई गई है.

China Buddhist Diplomacy: श्रीलंका, जिसे दुनिया भर में थेरवाद बौद्ध धर्म की जननी और इसकी गहरी आध्यात्मिक जड़ों के लिए जाना जाता है, आज एक ऐसे संकट से गुजर रहा है जो बाहर से तो नजर नहीं आता, लेकिन भीतर ही भीतर उसकी नींव को खोखला कर रहा है. हाल ही में ‘सीलोन वायर न्यूज’ की एक रिपोर्ट ने इस बात से पर्दा उठाया है कि चीन, श्रीलंका में बौद्ध धर्म को एक साधन की तरह इस्तेमाल कर रहा है ताकि वह अपनी कम्युनिस्ट विचारधारा को वहां की जड़ों में उतार सके.

बीजिंग की शातिर रणनीति

दिखने में यह सब ‘सांस्कृतिक आदान-प्रदान’ या ‘मित्रता’ जैसा लगता है, लेकिन हकीकत कुछ और है. बीजिंग की रणनीति बहुत ही शातिर है. रिपोर्ट के अनुसार, चीन श्रीलंका के प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार का काम अपने हाथों में लेता है, तीर्थ यात्राओं को प्रायोजित करता है और खुद को बौद्ध विरासत के रक्षक के तौर पर पेश करता है. लेकिन सवाल यह है कि एक नास्तिक कम्युनिस्ट पार्टी का बौद्ध धर्म से इतना लगाव क्यों?

धर्म एक हथियार

चीन ने धर्म को एक औजार की तरह पहचाना है. उसे पता है कि अगर श्रीलंका के लोगों के दिल और उनकी आस्था के साथ जुड़ना है, तो उनके मंदिरों में जगह बनानी होगी. यह सब सिर्फ संस्कृति की बात नहीं है, यह सीसीपी (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी) की उस बड़ी नीति का हिस्सा है जिसका मकसद अपनी ‘सॉफ्ट इमेज’ बनाना है, ताकि हंबनटोटा जैसे विवादित प्रोजेक्ट्स पर भी उसकी पकड़ बनी रहे.

आर्थिक मदद के नाम पर बदल रहा विचारधारा

हंबनटोटा पोर्ट जैसी महंगी परियोजनाओं के कर्ज ने श्रीलंका को इस कदर जकड़ लिया है कि अब उसे हर कदम पर चीन की शर्तों को मानना पड़ता है. वहीं, अब मामला सिर्फ ईंट-पत्थर या बंदरगाहों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब चीन का प्रभाव श्रीलंका के डिजिटल इकॉनमी प्लान और शासन व्यवस्था तक पहुंच गया है. आर्थिक मदद के नाम पर बीजिंग जिस तरह से अपनी विचारधारा को श्रीलंका की संस्थाओं में घोल रहा है, वह किसी भी संप्रभु देश के लिए खतरे की घंटी है.

क्या है मकसद?

चीन का मकसद साफ है, वह चाहता है कि श्रीलंका की बौद्ध संस्थाएं केवल ‘शाश्वत ज्ञान’ की संरक्षक न रहें, बल्कि वे सीसीपी के अधिनायकवादी नजरिए को बढ़ावा देने वाला एक मंच बन जाएं.

वहीं, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि श्रीलंका ने इस कूटनीति को नहीं समझा, तो उसकी सदियों पुरानी बौद्ध विरासत खतरे में पड़ सकती है. अगर इस वैचारिक हस्तक्षेप को नहीं रोका गया, तो श्रीलंका की पवित्र बौद्ध संस्थाएं ‘शाश्वत ज्ञान’ के केंद्र के बजाय चीन के विदेशी प्रचार (प्रोपेगेंडा) का एक जरिया बनकर रह जाएंगी.

ये भी पढ़ें: Mark Carney India Visit: कनाडा के पीएम ने PM मोदी के नेतृत्व की सराहना की, बोले- भारत के साथ चाहते हैं मजबूत संबंध

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read