Donald Trump Iran war threats timeline: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा महायुद्ध अब एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां दुनिया जीत-हार के दावों से ज़्यादा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ पर नज़र टिकाए हुए है. पिछले 40 दिनों में वॉशिंगटन से ऐसी-ऐसी आग उगलने वाली बातें निकलीं कि लगा जैसे ईरान अब बस चंद मिनटों का मेहमान है लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. कभी ‘ईरानी सभ्यता’ को मिटाने की कसम, तो कभी ‘कयामत की रात’ का डरावना ऐलान…ट्रंप के ये भारी-भरकम शब्द अब सवालों के घेरे में हैं क्योंकि इनमें से ज़्यादातर दावे वक़्त की कसौटी पर ‘फुस्स’ साबित हुए हैं.
गरजते रहे बादल पर नहीं बरसे ट्रंप
जंग की शुरुआत में 28 फरवरी को ट्रंप ने जब ईरान को तबाह करने और अयातुल्लाह को खत्म करने का एलान किया था, तब लगा था कि अमेरिकी मिसाइलें तेहरान को राख बना देंगी. इसके बाद 1 मार्च को तो सीधे ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता पलटने की बात कह दी गई, लेकिन दिन बीतते गए और ईरान का शासन अपनी जगह डटा रहा.
यहीं नहीं सबसे ज़्यादा किरकिरी तब हुई जब 21 मार्च को ट्रंप ने पूरी ठसक के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य को 24 घंटे में खोलने का अल्टीमेटम दिया, लेकिन वो तय समय सीमा बीत गई और समंदर का वो रास्ता जस का तस बंद रहा.
15 पॉइंट वाला वो ‘फ्लॉप’ शो
मार्च के आखिरी हफ्ते में ट्रंप की धमकियों की रफ्तार और बढ़ गई. 26 मार्च को उन्होंने ईरान को 10 दिन का आखिरी मौका देते हुए एक 15 पॉइंट वाला शांति प्रस्ताव भेजा और कहा कि अगर इसे नहीं माना गया तो अंजाम भयानक होगा. ईरान ने न सिर्फ उस प्रस्ताव को ‘अवास्तविक और बेकार’ बताते हुए कूड़ेदान में डाल दिया बल्कि ट्रंप की धमकियों को भी हवा में उड़ा दिया.
वहीं इसके बाद 30 मार्च को खार्ग द्वीप पर कब्जे का बड़ा एलान किया गया लेकिन हकीकत में अमेरिकी सेना को वहां वैसी सफलता नहीं मिली जैसी ट्रंप अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दुनिया को बता रहे थे.
कयामत की रात की धमकी भी हुई फुस्स
अप्रैल की शुरुआत होते ही ट्रंप के तेवर और भी ज्यादा आक्रामक हो गए थे. 5 और 6 अप्रैल को उन्होंने दावा किया कि वे ईरान की एनर्जी साइट्स, पुलों और पूरी सेना का कंट्रोल अपने हाथ में ले चुके हैं और अब ईरान के लिए ‘कयामत की रात’ आने वाली है.
उन्होंने यहां तक कह दिया कि वे पूरी ईरानी सभ्यता को ही इतिहास के पन्नों से मिटा देंगे. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि सभ्यता मिटाने के उस खतरनाक दावे के अगले ही दिन यानी 7 अप्रैल को खबर आई कि अमेरिका सीजफायर पर सहमत हो गया है. यानी जिस ‘कयामत’ का इंतज़ार था, वो अचानक दो हफ्तों के युद्धविराम में बदल गई.
यह भी पढ़ें: क्या वाकई पाकिस्तान ने कराया सीजफायर या कहानी कुछ और? शहबाज शरीफ के ‘कॉपी-पेस्ट’ पोस्ट से खुली पोल!
क्या मजबूरी में खींचे ट्रंप ने कदम?
पूरे 40 दिन के घटनाक्रम को देखें तो ट्रंप बार-बार अपने ही दिए गए अल्टीमेटम से पीछे हटते दिखे. 21 मार्च के 48 घंटे वाले अल्टीमेटम के बाद अचानक 23 मार्च को उन्होंने खुद ही 5 दिन के लिए हमले टाल दिए. फिर 26 मार्च को 10 दिन तक हमले रोकने की बात की और जब पानी सिर से ऊपर गया तो 4 अप्रैल को फिर से 48 घंटे का नया अल्टीमेटम जारी कर दिया.
बताते चलें कि ट्रंप की धमकियों के इस उतार-चढ़ाव भरे ग्राफ ने यह साफ कर दिया कि ट्रंप की कूटनीति में जितना शोर ‘हमलों’ का था, उससे कहीं ज़्यादा पर्दे के पीछे ‘समझौते’ की कोशिशें चल रही थीं, जिसने आखिरकार उन्हें सीजफायर की मेज पर ला खड़ा किया.
Also Follow Bharat Express on Youtube
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

