भारत, नेपाल और चीन के त्रिकोणीय सीमा विवाद को लेकर बीजिंग से एक बड़ी कूटनीतिक खबर सामने आई है. लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा के विवादित सीमा क्षेत्र पर चीन का समर्थन पाने की उम्मीद लगाए बैठे नेपाल को बीजिंग ने बड़ा झटका दिया है. चीन के दौरे पर गए नेपाल के नए विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने जब चीनी विदेश मंत्री वांग यी के सामने लिपुलेख का मुद्दा उठाया, तो चीन ने इस मामले से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया. चीनी विदेश मंत्री ने दोटूक शब्दों में कहा कि यह भारत और नेपाल के बीच का सीमा विवाद है, जिसे दोनों देशों को आपस में राजनयिक बातचीत के जरिए सुलझाना चाहिए.
नेपाली विदेश मंत्री ने बीजिंग में उठाया था मुद्दा
नेपाल में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) की सरकार बनने के बाद विदेश मंत्री शिशिर खनाल बीजिंग के चार दिवसीय आधिकारिक दौरे पर पहुंचे. चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक में खनाल ने लिपुलेख दर्रे से व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा शुरू करने के भारत और चीन के फैसले पर असंतोष जताया. नेपाली विदेश मंत्री ने चीन को याद दिलाया कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल का हिस्सा हैं. उन्होंने यह भी कहा कि इस क्षेत्र में बिना नेपाल की सहमति के किसी भी गतिविधि को लेकर काठमांडू ने नई दिल्ली और बीजिंग दोनों को ‘प्रोटेस्ट नोट’ (राजनयिक विरोध पत्र) भेजा था.
चीन ने पल्ला झाड़ा, नेपाल का दांव पड़ा उल्टा
नेपाल को उम्मीद थी कि भारत के साथ जारी सीमा गतिरोध के बीच चीन इस मुद्दे पर उसका साथ देगा. लेकिन चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने साफ कर दिया कि चीन इस द्विपक्षीय विवाद में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा. चीनी अधिकारियों के अनुसार, वांग यी ने कहा, “यह मुद्दा पूरी तरह से नेपाल और भारत के बीच का सीमा मामला है, इसमें चीन और नेपाल के बीच कोई विवाद नहीं है. इसलिए इसे राजनयिक संवाद के जरिए सुलझाया जाना चाहिए”. चीन के इस रुख से साफ है कि वह भारत के साथ अपने व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को सामान्य बनाने के लिए नेपाल के ‘चाइना कार्ड’ के बहकावे में आने को तैयार नहीं है.
क्या है लिपुलेख और कालापानी का पूरा विवाद?
यह विवाद मुख्य रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे और कालापानी क्षेत्र को लेकर है. भारत और चीन ने आपसी द्विपक्षीय समझौतों के तहत इस रास्ते को व्यापार और तीर्थयात्रा के लिए खोलने पर सहमति जताई है. भारत का रुख हमेशा से स्पष्ट रहा है कि यह क्षेत्र पूरी तरह से भारतीय संप्रभुता के अंतर्गत आता है और यहां दशकों से कैलाश मानसरोवर यात्रा का संचालन होता आया है. वहीं, नेपाल का दावा है कि महाकाली नदी के पूर्व का यह पूरा इलाका उसका अभिन्न अंग है. साल 2020 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को अपने क्षेत्र में दिखाया था, जिसे भारत ने “एकतरफा और कृत्रिम दावा” बताकर पूरी तरह खारिज कर दिया था.
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और चीन के बीच हाल के महीनों में बढ़े व्यावहारिक और व्यापारिक तालमेल के कारण नेपाल अलग-थलग पड़ता दिख रहा है. दिलचस्प बात यह है कि बीजिंग आने से ठीक एक हफ्ते पहले नेपाली विदेश मंत्री शिशिर खनाल भारत के दौरे पर भी आए थे और उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की थी, लेकिन तब उन्होंने नई दिल्ली में लिपुलेख या कालापानी का मुद्दा उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई थी. अब चीन द्वारा भी हाथ खड़े कर लेने के बाद नेपाल के पास भारत के साथ शांतिपूर्ण द्विपक्षीय बातचीत की मेज पर आने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है.
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-भारत एक्सप्रेस
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