Rajput Vs Brahmin In Nepal: नेपाल इस समय गंभीर राजनीतिक संकट से गुजर रहा है. भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म और सोशल मीडिया बैन से उपजा युवाओं का गुस्सा आखिरकार नेपाल से केपी ओली की सरकार को उखाड़ फेंका. ओली अपने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर हेलीकॉप्टर से फरार हो गए. कई नेताओं को लोगों ने सड़कों पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा.
केपी ओली को सत्ता से उखाड़ फेंकने के बाद एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. जिसमें नेपाली टोपी लगाये एक व्यक्ति प्रदर्शनकारियों के बीच जाता है. इस दौरान सारे प्रदर्शनकारी उसके पीछे-पीछे ‘जय राजा की और जय नेपाल’ के नारे लगाते हुए चलते दिखाई देते हैं. आखिर कौन है वो व्यक्ति जिसको नेपाल की जनता अपने सिर-आंखों पर बैठाये दिख रही है. आखिर नेपाल के इतिहास में इस व्यक्ति का क्या महत्व रहा है? आइये जानते हैं.
राजशाही के खिलाफ बगावत
साल था 1996, नेपाल में तब राजशाही थी. नेपाल की सत्ता पर राजा बीरेंद्र शाह का शासन था. उस समय नेपाल भयंकर बेरोजगारी, गरीबी और असमानता के दौर से गुजर रहा था. तभी एक बाहुन (जिसे भारत में ब्राह्मण कहा जाता है) अपने कुछ लोगों के साथ राजा के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर देता है. वो बाहुन माओवादी विचारधारा से प्रेरित था. इसलिए इस विद्रोह को माओवादी आंदोलन कहा जाता है. इस आंदोलन को खड़ा करने वाला कोई और नहीं बल्कि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल प्रचंड थे.
पुष्पकमल दहाल प्रचंड ने शुरू किया आंदोलन
उन्होंने देश में घूम-घूमकर राजशाही के खिलाफ लोगों में गुस्सा भरा. देश के लोगों को बताया कि जनता जहां गरीबी, बेरोजगारी और असमानता से घिरी हुई है. तो वहीं देश का राजा उनका खून चूसकर अपने महल में शानो शौकत की जिंदगी जी रहा है. जनता को जहां दो वक्त की रोटी नहीं मिल पा रही, वहीं राजा अपने महल में हर दिन पकवान खा रहा है. अपने रौबदार आवाज और सम्मोहित कर देने वाले भाषणों से प्रचंड जनता को राजशाही के खिलाफ भड़का रहे थे. प्रचंड चाहते थे कि नेपाल में लोकतंत्र स्थापित हो और जनता का शासन आए. पुष्पकमल दहाल प्रचंड के इस काम में कई और लोग भी मदद कर रहे थे. जिसमें केपी ओली भी शामिल थे. खास बात ये है कि माओवादी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अधिकतर लोग ब्राह्मण थे.
जनता में बढ़ रहा था आक्रोश
जनता में राजशाही के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा था. तभी कुछ ऐसा होता है कि जनता आंदोलन के लिये मचल उठती है. दरअसल 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने तख्तापलट कर दिया और सारी सत्ता अपने हाथों में ले ली. बता दें कि, 1990 में नेपाल में हुए जनआंदोलन के बाद राजा ने नेपाल में बहुदलीय लोकतंत्र बहाल कर दी थी, लेकिन राजशाही फिर भी बरकरार थी.
2008 में पुरानी राजशाही का अंत हुआ
राजा के इस कदम पर जनता का गुस्सा फूट पड़ा. जनता सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने लगी. माओवादियों और राजनीतिक दलों के दबाव में आकर राजा ज्ञानेंद्र को आखिरकार झुकना पड़ा. 28 मई 2008 में नेपाल के संविधान सभा ने 540-4 के बहुमत से राजशाही को खत्म कर दिया. इसके बाद नेपाल को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर दिया गया. इस तरह से नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हो गया. राजा ज्ञानेंद्र को अपने निवास स्थान नारायणहिटी पैलेस छोड़ना पड़ा और वो एक आम नागरिक बनकर रह गए. 1996 से लेकर 2006 तक चले इस गृहयुद्ध में नेपाल में 16 हजार से अधिक लोग मारे गए.
राजपूत हुए नाराज
राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल का एक वर्ग खासा नाराज हो गया. ये वर्ग था राजपूतों का. नेपाल में राजपूतों या क्षत्रियों को छेत्री कहा जाता है. उस समय नेपाल के राजपूतों को जनता के विरोध के चलते सत्ता छोड़नी पड़ी. 240 सालों से नेपाल की सत्ता में बने रहने वाले राजपूत अचानक से आम आदमी बन गए.
सत्ता में ब्राह्मणों का बोलबाला
देश में लोकतंत्र तो लागू हो गया लेकिन, आम जनता को फिर भी भागीदारी नहीं मिली. नेपाल में लोकतंत्र स्थापित होने के बाद सत्ता अधिकतर ब्राह्मणों के पास ही रही. चाहे नेपाल का राष्ट्रपति का पद हो, प्रधानमंत्री का, सेना प्रमुख का या संसद के स्पीकर का. जिसको लेकर आम जनता में भी आक्रोश भरता रहा. नेपाल में मौजूदा राजनीतिक संकट के पीछे भी इसी जातिवाद को बड़ा फैक्टर माना जा रहा है. नेपाल की जनता में सालों से इस बात को लेकर नाराजगी रही कि नेपाल की सरकारों में और सरकारी व्यवस्था में ब्राह्मणों का ही कब्जा है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेपाल में फैले भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने फिर से राजशाही लाने की मांग कर रही थी.
नेपाल में 29 फीसदी हैं खस आर्य
नेपाल में ब्राह्मणों की आबादी 12.2 फीसदी है, हर क्षेत्र में इनका दबदबा है. नेपाल का सबसे बड़ा जातीय समूह छेत्री या क्षत्रिय है. जिन्हें राजपूत भी कहा जाता है. नेपाल में राजपूतों की आबादी 16.6 फीसदी है. यहां दोनों वर्गों को मिलाकर खस आर्य कहा जाता है. नेपाली सरकार में ब्राह्मणों के दबदबा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अधिकतर समय सत्ता इन्हीं के पास रही. केपी ओली भी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं. इसके अलावा पूर्व पीएम प्रचंड और बीपी कोइराला भी ब्राह्मण ही थे. एक वजह ये भी रही कि नेपाल में दूसरी जातियों को समान अवसर नहीं मिले, जिसकी वजह से इनकी सरकार के प्रति नाराजगी बढ़ती चली गई. लोग यहां तक कहने लगे कि नेपाल में कम्युनिस्ट राज है या ब्राह्मण राज?
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नेपाल में शाह वंश का इतिहास क्या है?
नेपाल के इतिहास में शाह वंश सबसे ताकतवर माना जाता रहा है. इसकी स्थापना 1768 में गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने की थी. उन्होंने नेपाल के सभी छोटे-छोटे रजवाड़ों को इकट्ठा कर आधुनिक नेपाल की नींव रखी. राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1769 में काठमांडू, पाटन और भदगांव के तीन मल्ल राज्यों पर विजय प्राप्त कर आधुनिक नेपाल का गठन किया. शाह वंश अपने आपको प्राचीन भारत के राजपूतों का वंशज बताता है.
– भारत एक्सप्रेस
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