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नेपाल की क्रांति: राष्‍ट्रपति-प्रधानमंत्री का इस्‍तीफा, लोकतंत्र का संकट और राजशाही की छाया

Nepal Protests: नेपाल में लोकतंत्र डगमगा रहा है, जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त आ चुकी है. राजशाही की मांग फिर उठ रही है. युवा सड़कों पर, बदलाव की पुकार. सवाल उठ रहा है कि क्या यह नया अध्याय है?

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Vijay Ram Edited by Vijay Ram

नेपाल, हिमालय की गोद में बसा यह छोटा-सा देश, आज फिर एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. अधूरी क्रांति की ज्वाला, लोकतंत्र की डगमगाती नींव और राजशाही की साये में छिपी उम्मीदें – ये सब मिलकर एक ऐसा तूफान खड़ा कर रहे हैं, जिसमें युवा पीढ़ी की पुकार सबसे तेज है.

9 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के इस्तीफे ने इस संकट को चरम पर पहुंचा दिया है. जनता का गुस्सा भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म और सोशल मीडिया प्रतिबंध के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है, जहां 19 से अधिक मौतें हो चुकी हैं. क्या यह अधूरी क्रांति का नया अध्याय है, या लोकतंत्र की असफलता राजशाही को फिर बुलावा दे रही है?

राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी

नेपाल का इतिहास राजनीतिक उथल-पुथल की कहानी है. 1996 में शुरू हुए माओवादी आंदोलन ने दस वर्षों तक देश को जंग में झोंक दिया. हजारों जानें गईं, गांव-गांव में विद्रोह की आग लगी. 2006 के शांति समझौते ने उम्मीद जगाई-नया संविधान, 2008 में 240 वर्ष पुरानी राजशाही का अंत और गणराज्य की घोषणा. लेकिन क्या यह बदलाव आम आदमी तक पहुंचा? क्रांति ने सत्ता के चेहरे तो बदल दिए, मगर व्यवस्था वही रही. भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा लीं, अवसरवाद ने फैलाव किया. वर्ल्ड बैंक के अनुसार, 2024 में नेपाल की प्रति व्यक्ति आय मात्र 1,381 डॉलर रही, जबकि पड़ोसी भारत की लगभग दोगुनी. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में सुधार न होने से युवा निराश हैं. छात्र नेता कहते हैं, “लोकतंत्र वादों का मेला बन गया, लेकिन विकास की राहें अधर में लटक गईं.”

स्थिरता से कोसों दूर रही यह यात्रा

लोकतंत्र की यह यात्रा स्थिरता से कोसों दूर रही. 2006 से 2025 तक-17 वर्षों में 14 प्रधानमंत्री! पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’, बाबुराम भट्टराई, सुशील कोइराला, केपी ओली और शेरबहादुर देउबा जैसे दिग्गज सत्ता में आए, मगर कोई अपना कार्यकाल पूरा न कर सका. सत्ता की होड़ में राजनीतिक दल जनता के सपनों को कुचलते रहे. ओली का चौथा कार्यकाल जुलाई 2024 में शुरू हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों और अस्थिर गठबंधन ने इसे कमजोर कर दिया. नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल की कोअलिशन सरकार ने वादे किए, मगर नेपोटिज्म का खुला प्रदर्शन-राजनेताओं के बच्चों की लग्जरी लाइफ-युवाओं को भड़का गया.

अमीरों की चकाचौंध और गरीबों की बदहाली

टिकटॉक पर #नेपोकिड्स और #नेपोबेबी जैसे हैशटैग वायरल हुए, जहां अमीरों की चकाचौंध गरीबों की बदहाली से टकराई. इस निराशा ने 2025 में राजशाही की वापसी की मांग को हवा दी. मार्च में काठमांडू में हजारों ने “राजा वापस आओ, देश बचाओ” के नारे लगाए. पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह, जिन्हें 2008 में सत्ता से हटाया गया, फिर चर्चा में हैं. समर्थक मानते हैं कि राजशाही में भ्रष्टाचार कम और स्थिरता अधिक थी. मई में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेतृत्व में विशाल रैली हुई, जहां हिंदू राष्ट्र और संवैधानिक राजतंत्र की मांग उठी. हालांकि, इतिहास राजशाही को निर्दोष नहीं मानता-2001 का शाही नरसंहार और 2005 में लोकतंत्र निलंबन ने ज्ञानेंद्र की छवि खराब की. फिर भी, लोकतंत्र की विफलताएं जनता को अतीत की ओर धकेल रही हैं.

Nepal Protest

26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बैन करना

सितंबर 2025 का संकट चरम पर पहुंचा जब 4 सितंबर को सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स- फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब, एक्स आदि-पर बैन लगा दिया. कारण? पंजीकरण न करना. लेकिन युवाओं ने इसे सेंसरशिप का हथियार माना. भ्रष्टाचार के वीडियो वायरल होने से घबराई सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी दांव पर लगा दी. 8 सितंबर को काठमांडू में जेन जेड आंदोलन फूट पड़ा. संसद भवन के बाहर हजारों युवा-कई स्कूल यूनिफॉर्म में-उतर आए. नारे लगे: “भ्रष्टाचार बंद करो, सोशल मीडिया खोलो!”
पुलिस ने रबर बुलेट्स, आंसू गैस और गोलीबारी की, 19 मौतें हुईं, सैकड़ों घायल. अगले दिन बैन हटा, मगर गुस्सा शांत न हुआ. प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, नेपाली कांग्रेस कार्यालय और ओली, देउबा, दाहाल के घरों में आग लगा दी. एयरपोर्ट बंद, कर्फ्यू लगा. ओली ने इस्तीफा दिया, कहा-“संवैधानिक समाधान के लिए.”

प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को देना पड़ा इस्तीफा

आज नेपाल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पौडेल ने भी इस्तीफा दे दिया, इसके बाद नए नेतृत्व की प्रक्रिया शुरू हो गई है. कई मंत्री-रमेश लेखक, प्रदीप पौडेल-नैतिक आधार पर हटे.

Nepal Hindu Rashtra Protest

यह संकट तीन ध्रुवों के बीच का संघर्ष है: अधूरी माओवादी क्रांति, जो समानता का वादा कर व्यवस्था न बदल सकी; अस्थिर लोकतंत्र, जो 14 सरकारों में जनता को निराश करता रहा; और राजशाही, जो खत्म होकर भी सिर उठा रही है.

जेन जेड का आंदोलन बिना नेतृत्व के उभरा, जो पुरानी राजनीति से तृप्त है. वे नई सरकार, शीघ्र चुनाव और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई चाहते हैं. लेकिन क्या यह बदलाव लाएगा? नेपाल बार-बार अतीत की जंजीरों से टकरा रहा है. राजशाही का भूत इसलिए सताता है, क्योंकि लोकतंत्र विफल रहा. युवाओं की पुकार सुननी होगी-वरना यह अधूरी क्रांति और गहरी हो जाएगी. नेपाल को स्थिरता, न्याय और विकास चाहिए, न कि सत्ता की तिकड़म.

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