US foreign policy: अमेरिका की राजनीति में ट्रंप प्रशासन ने एक ऐसी रणनीति अपनाई है, जिसे विशेषज्ञ “नया रेजीम चेंज मॉडल” कह रहे हैं. इसका मकसद किसी देश की सरकार को पूरी तरह कब्जा करने के बजाय सीमित सैन्य कार्रवाई और राजनीतिक दबाव के जरिए सत्ता परिवर्तन करना है. इस मॉडल के चार बड़े हिस्से बताए जा रहे हैं, जिनके जरिए अमेरिका अपने हित साधने की कोशिश कर रहा है.
गुप्त मिशन और अचानक हमले
इस रणनीति की शुरुआत खुफिया एजेंसियों की सक्रियता से होती है. CIA जैसी संस्थाएं अंडरकवर ऑपरेशन चलाकर लक्ष्य देश की राजनीतिक और सैन्य स्थिति का आकलन करती हैं. इसके बाद अचानक हवाई हमले किए जाते हैं ताकि सत्ता के शीर्ष नेताओं और सैन्य ढांचे को कमजोर किया जा सके. ईरान में सुप्रीम लीडर खामेनई की मौत के बाद इस मॉडल की चर्चा तेज हुई थी. इससे पहले जनवरी 2026 में वेनेजुएला पर आधी रात को हमला कर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर अमेरिका ले जाया गया. यह कदम ऐतिहासिक माना गया क्योंकि इससे पहले 1989 में पनामा के जनरल नोरिएगा को पकड़ा गया था, लेकिन किसी मौजूदा राष्ट्रपति को हटाकर अमेरिका ले जाने की मिसाल पहली बार बनी.
सत्ता का ढांचा बरकरार
इस मॉडल की खासियत यह है कि अमेरिका पूरे सिस्टम को ध्वस्त नहीं करता, बल्कि ऐसा नेता लाने की कोशिश करता है जो उसके हितों के अनुसार काम करे. वेनेजुएला में मादुरो को हटाने के बाद सत्ता का ढांचा जस का तस रहा और उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज जैसे नेताओं के साथ काम करने की बात सामने आई. इससे अमेरिका को वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार तक पहुंच मिली. ईरान के मामले में भी जनवरी 2026 में खबर आई कि विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी कारोबारी स्टीव विटकॉफ को संदेश भेजकर 800 प्रदर्शनकारियों की फांसी रोकने की जानकारी दी. इसी वजह से तत्काल हमले का आदेश टाल दिया गया.
रूस-चीन के सहयोगियों पर दबाव
इस रणनीति का तीसरा पहलू उन देशों को निशाना बनाना है जो रूस और चीन के करीबी हैं. पहले सैन्य दबाव बनाया जाता है और फिर राजनीतिक अभियान चलाकर यह संदेश दिया जाता है कि ये सरकारें कमजोर हैं और भरोसेमंद साझेदार नहीं. वेनेजुएला रूस और चीन दोनों का करीबी सहयोगी है. चीन उसका सबसे बड़ा तेल खरीदार था. अमेरिका का संदेश साफ है कि रूस और चीन अपने सहयोगियों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं. ईरान भी रूस का नजदीकी है और यूक्रेन युद्ध में ड्रोन व मिसाइल सप्लाई करता रहा है. ईरान पर दबाव डालकर ट्रंप रूस को भी चुनौती दे रहे हैं.
सैन्य दबाव के बाद कारोबारी फायदे
इस मॉडल का चौथा हिस्सा आर्थिक समझौते हैं. सैन्य दबाव बनाने के बाद अमेरिका नए नेताओं या सरकारों के साथ व्यापारिक डील करता है. इसका मकसद तेल, व्यापार और सुरक्षा से जुड़े फायदे हासिल करना है. इसे “हम हमला करेंगे, फैसला आप करें” वाली नीति कहा जा रहा है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ हवाई हमलों से किसी मजबूत सरकार को गिराना आसान नहीं होता. कई लोगों को डर है कि इससे सत्ता का खालीपन पैदा हो सकता है और गृहयुद्ध जैसी स्थिति भी बन सकती है.
ट्रंप प्रशासन की यह रणनीति पारंपरिक रेजीम चेंज से अलग है. इसमें पूरे सिस्टम को तोड़ने के बजाय सीमित सैन्य कार्रवाई, राजनीतिक दबाव और कारोबारी समझौते का मिश्रण है. लेकिन सवाल यही है कि क्या यह मॉडल स्थिरता ला पाएगा या फिर नए संकटों को जन्म देगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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