वैश्विक शासन (Global Governance) सुधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ब्रिक्स संदेश एक बहुत ही सीधे और स्पष्ट तर्क पर टिका है: पुरानी दुनिया के लिए बनी संस्थाएं आज की अधिक जटिल और बहुध्रुवीय (Multipolar) दुनिया के लिए फैसले नहीं ले सकतीं. उनका 10-सूत्रीय रोडमैप सुरक्षा परिषद सुधार, वित्तीय संस्थानों में बदलाव, तकनीकी नियमों के निर्धारण और ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व को एक बड़े साझा एजेंडे के तहत सामने रखता है. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर नजर रखने वाले पाठकों, विशेष रूप से यूपीएससी की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए इसका मुख्य सबक यह है कि भारत इस सुधार को केवल अपने लिए स्थायी सीट की मांग के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में निष्पक्षता, वैधता और प्रभावशीलता की कसौटी के रूप में प्रस्तुत कर रहा है.
पीएम मोदी ने ब्रिक्स में क्या प्रस्ताव रखा?
पीएम मोदी ने प्रस्ताव दिया कि ब्रिक्स को वैश्विक शासन सुधार के लिए 10-सूत्रीय रोडमैप पर काम करना चाहिए, जिसमें प्रतिनिधित्व (Representation), जवाबदेही/सक्रियता (Responsiveness), और नियम निर्माण (Rule-Making) पर ध्यान केंद्रित हो. नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, उनका मुख्य संदेश दुनिया को ‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ (Pyramid of Privilege) से निकालकर ‘साझेदारी के मंच’ (Platform of Partnership) की ओर ले जाना है, जहां ग्लोबल साउथ केवल वैश्विक फैसलों का असर झेलने वाला न रहे, बल्कि उन फैसलों को तय करने में भी मददगार बने. उन्होंने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधार एक तय समय-सीमा और स्पष्ट नतीजों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जबकि वित्तीय संस्थानों और भविष्य की प्रौद्योगिकियों से जुड़े नियमों में आज की वास्तविकताओं का अक्स दिखना चाहिए.
यह बात इस प्रस्ताव को केवल भारत के लिए दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर एक कुर्सी मांगने तक सीमित नहीं रखती. यह यूएनएससी सुधार को बहुपक्षीय विकास बैंकों, वैश्विक वित्तीय वोटिंग अधिकारों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) गवर्नेंस, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष, बायोटेक्नोलॉजी, क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज और समुद्री सुरक्षा से जोड़ता है. सीधे शब्दों में कहें तो, यह प्रस्ताव कहता है कि निर्णय लेने की शक्ति, संस्थागत नियम और संकट से निपटने के तंत्र वहीं होने चाहिए जहां आज वास्तव में आबादी, आर्थिक विकास, खतरे और नवाचार मौजूद हैं.
UNSC में सुधार अब और क्यों नहीं टल सकता?
सुरक्षा परिषद में सुधार अब और इसलिए नहीं टल सकता क्योंकि इसकी मौजूदा संरचना आज भी 1945 के शक्ति संतुलन को दर्शाती है, जबकि आज के संकट कहीं अधिक व्यापक, तेज और पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. परिषद में कुल 15 सदस्य हैं: पांच स्थायी सदस्य—चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका—तथा दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाने वाले 10 अस्थायी सदस्य. इसका असंतुलन बिल्कुल साफ दिखता है: अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और विकासशील दुनिया का एक बड़ा हिस्सा युद्धों, प्रतिबंधों, शांति मिशनों, खाद्य असुरक्षा, ऊर्जा संकट और आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है, लेकिन इसके बावजूद सुरक्षा परिषद में उनका कोई स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है.
जब दुनिया एक साथ कई संकटों से जूझ रही हो, तब यूएनएससी सुधारों की जरूरत और भी बढ़ जाती है. यूरोप और पश्चिम एशिया में संघर्ष, समुद्री व्यापार में रुकावटें, जलवायु संकट, कर्ज का दबाव, साइबर खतरे, आतंकवाद और महत्वपूर्ण तकनीकों की होड़—इन सभी से निपटने के लिए ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता है जो तेजी से और बिना किसी पक्षपात के काम कर सकें. यदि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार परिषद को ही असंतुलित और गैर-प्रतिनिधिक माना जाएगा, तो उसके फैसलों की वैधता पर अमल शुरू होने से पहले ही सवाल खड़े हो जाएंगे.
भारत के लिए यह कोई नया रुख नहीं है. नई दिल्ली लंबे समय से कहती रही है कि संयुक्त राष्ट्र सुधारों में सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों का विस्तार शामिल होना चाहिए. रियो डी जेनेरो में आयोजित 2025 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी पीएम मोदी ने इसी तरह कहा था कि समकालीन वास्तविकताओं को दर्शाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, आईएमएफ, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाओं में तत्काल सुधार की जरूरत है.
सीधे-सरल शब्दों में UNSC सुधार की बहस
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) वह निकाय है जिसके पास अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी है. यह शांति सेना (Peacekeeping Missions) भेजने का फैसला कर सकती है, प्रतिबंध लगा सकती है, बल प्रयोग की मंजूरी दे सकती है और संघर्षों से निपटने की दिशा तय कर सकती है. इस भारी ताकत के कारण, परिषद में कौन बैठता है यह कोई प्रतीकात्मक सवाल नहीं है; यह तय करता है कि किसकी सुरक्षा चिंताओं को सुना जाएगा, किस क्षेत्र को प्राथमिकता मिलेगी और किसके विचारों से फैसले बनेंगे.
मौजूदा व्यवस्था में पांच देशों के पास स्थायी सीट और वीटो पावर (निषेधाधिकार) है. बाकी दस सदस्य सीमित समय के लिए चुने जाते हैं, जिससे व्यापक भागीदारी तो दिखती है लेकिन उनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं होता. यह व्यवस्था दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद बनी थी, जब दुनिया का भू-राजनीतिक नक्शा, औपनिवेशिक हालात, आबादी का वितरण, आर्थिक ताकत और संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों की संख्या आज से बिल्कुल अलग थी.
सुधार की इस बहस में आमतौर पर पांच मुख्य मुद्दे शामिल होते हैं:
- सदस्यता की श्रेणियां: क्या केवल अस्थायी सीटें बढ़ाई जाएं, या स्थायी सीटें भी जोड़ी जाएं?
- क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व: अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, लैटिन अमेरिका और छोटे देशों को कैसे प्रतिनिधित्व मिले?
- वीटो पावर: क्या नए स्थायी सदस्यों को वीटो मिले, या फिर मौजूदा वीटो के इस्तेमाल पर सीमाएं लगाई जाएं?
- परिषद का आकार: परिषद को बहुत भारी या अप्रभावी बनाए बिना इसमें कितने और सदस्य जोड़े जा सकते हैं?
- कामकाज के तरीके (Working Methods): पारदर्शिता, जवाबदेही और गैर-सदस्यों की भागीदारी को कैसे बेहतर बनाया जाए?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद सुधार पर अंतर-सरकारी वार्ताएं (Intergovernmental Negotiations – IGN) कई सत्रों से लगातार चल रही हैं, लेकिन यह प्रक्रिया बेहद धीमी और राजनीतिक रूप से जटिल बनी हुई है. यही कारण है कि भारत द्वारा एक तय समय-सीमा और स्पष्ट नतीजों पर जोर देना बहुत मायने रखता है: यह सुधार को बिना किसी फैसले के केवल चर्चा तक सीमित रखने की आदत को सीधी चुनौती देता है.
10-सूत्रीय रोडमैप के तीन मुख्य स्तंभ
पीएम मोदी के ब्रिक्स प्रस्ताव के तीन मुख्य आधार स्तंभ हैं: प्रतिनिधित्व (Representation), सक्रियता/जवाबदेही (Responsiveness), और नियम निर्माण (Rule-Making). ये स्तंभ इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये संस्थागत सुधार की बहस को विकासशील देशों के रोजमर्रा के नीतिगत मुद्दों से जोड़ते हैं.
1. प्रतिनिधित्व: जहां फैसले हों, वहां आवाज मिले
प्रतिनिधित्व यूएनएससी सुधार का सबसे जाना-माना पहलू है. भारत का तर्क है कि यदि दुनिया के सबसे बड़े क्षेत्रों और प्रमुख विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को बाहर रखा जाएगा, तो कोई भी संस्था लोकतांत्रिक वैधता का दावा नहीं कर सकती. ब्रिक्स घोषणापत्रों ने लगातार संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार का समर्थन किया है, जिसमें सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों और खासकर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के मजबूत प्रतिनिधित्व की बात कही गई है. 2025 के रियो डी जेनेरो घोषणापत्र ने भी सुरक्षा परिषद सहित संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका निभाने की भारत और ब्राजील की आकांक्षाओं को स्वीकार किया था.
व्यवहार में, प्रतिनिधित्व का सीधा असर एजेंडा तय करने पर पड़ता है. एक अधिक प्रतिनिधिक परिषद विकास-सुरक्षा संबंधों, कर्ज संकट, विकासशील देशों को प्रभावित करने वाले आतंकवाद, समुद्री असुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों की रोकथाम पर अधिक ध्यान दे सकती है. यह भू-राजनीतिक होड़ को रातों-रात खत्म नहीं कर देगा, लेकिन संस्था को पुराना या पक्षपाती बताकर खारिज करना मुश्किल बना देगा.
2. सक्रियता/जवाबदेही: संस्थाएं जो समय पर कदम उठाएं
सक्रियता का मतलब है कि क्या वैश्विक संस्थाएं संकट के आपदा बनने से पहले कदम उठा सकती हैं. कई विकासशील देश वैश्विक झटकों को कूटनीतिक बयानों के रूप में नहीं, बल्कि महंगाई, आवश्यक वस्तुओं की कमी, शरणार्थियों के संकट, कर्ज के दबाव, खाद्य असुरक्षा और सुरक्षा खतरों के रूप में सीधे झेलते हैं. यदि संस्थाएं मदद करने में बहुत देर लगाती हैं, या चुनिंदा मामलों में ही सक्रिय होती हैं, तो देशों का बहुपक्षवाद से भरोसा उठने लगता है.
यहीं पर पीएम मोदी का ब्रिक्स संदेश सुरक्षा परिषद से आगे फैलता है. उन्होंने शासन सुधार को वित्तीय संस्थाओं और विकास की जरूरतों से जोड़ते हुए कहा कि वैश्विक वित्तीय निकायों में वोटिंग पावर, नेतृत्व और प्राथमिकताएं आज की आर्थिक सच्चाइयों के अनुकूल होनी चाहिए. यह इसलिए जरूरी है क्योंकि आज शांति और सुरक्षा का सीधा संबंध वित्त, प्रौद्योगिकी तक पहुंच, जलवायु अनुकूलन और स्थिर सप्लाई चेन से जुड़ चुका है.
3. नियम निर्माण: भविष्य के नियम तय करने वाला बनें, केवल मानने वाले नहीं
नियम निर्माण सबसे दूरदर्शी स्तंभ है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), साइबर स्पेस, अंतरिक्ष, बायोटेक्नोलॉजी और क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज जैसे क्षेत्र भविष्य की शक्ति के नियम तय कर रहे हैं. यदि विकासशील देश केवल नियमों का पालन करने वाले (Rule-Takers) बने रहे, तो भविष्य की वैश्विक प्रणालियां पुरानी असमानताओं को नए रूपों में दोहराने लगेंगी.
पीएम मोदी का यह कहना कि ग्लोबल साउथ को ‘नियम निर्माता’ (Rule-Shaper) बनना चाहिए, प्रौद्योगिकी, विकास और संप्रभुता को आपस में जोड़ने के भारत के व्यापक प्रयास को दर्शाता है. 2025 में ब्रिक्स में भी भारत ने जिम्मेदार AI, सुरक्षित क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन, ग्लोबल साउथ के लिए विज्ञान और अनुसंधान रिपोजिटरी, तथा न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) के जरिए मांग-आधारित टिकाऊ फंडिंग की बात कही थी.
ग्लोबल गवर्नेंस प्रस्ताव के 10 मुख्य बिंदु
सार्वजनिक रूप से सामने आए प्रस्ताव में 10-सूत्रीय रोडमैप की बात कही गई है, जिसे घोषित रूपरेखा के आधार पर 10 मुख्य सुधार दिशाओं में समझा जा सकता है:
1. UNSC सुधार के लिए एक समय-सीमा तय हो
पहला और सबसे जरूरी बिंदु यह है कि यूएनएससी सुधारों को अंतहीन चर्चाओं से निकालकर एक तय समय-सीमा वाली वार्ता में बदला जाए. भारत की आपत्ति यह नहीं है कि इस मुद्दे की अनदेखी हो रही है; बल्कि यह है कि एक ही प्रक्रिया बिना किसी ठोस नतीजे के बार-बार दोहराई जा रही है. एक निश्चित समय-सीमा तय होने से सदस्य देशों को अपना रुख स्पष्ट करना होगा और यह देखना होगा कि कहां आम सहमति बन सकती है.
2. ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व का विस्तार हो
दूसरा बिंदु उन देशों के व्यापक प्रतिनिधित्व से जुड़ा है जो वैश्विक फैसलों के सीधे परिणाम भुगतते हैं. ब्रिक्स लगातार खुद को उन उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच के रूप में स्थापित कर रहा है जो वैश्विक संस्थाओं में बड़ी आवाज चाहते हैं. 2026 तक 11 सदस्यों के साथ ब्रिक्स दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे अधिक प्रतिनिधित्व की उसकी यह मांग राजनीतिक रूप से बहुत वजनदार हो जाती है.
3. स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों में सुधार हो
भारत और जी-4 (G4) समूह—ब्राजील, जर्मनी, भारत और जापान—ने सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों के विस्तार का पुरजोर समर्थन किया है. जी-4 मॉडल परिषद की सदस्य संख्या को 15 से बढ़ाकर 25 या 26 करने का प्रस्ताव देता है, जिसमें छह स्थायी और चार या पांच अस्थायी सीटें जोड़ी जाएं. भारत का स्पष्ट मानना है कि केवल अस्थायी सीटों का विस्तार करने से स्थायी सदस्यता में मौजूद गहरा असंतुलन दूर नहीं होगा.
4. अफ्रीका को सुधारों में केंद्रीय स्थान मिले
किसी भी विश्वसनीय सुधार के लिए यह जरूरी है कि स्थायी सदस्यता में अफ्रीका की गैर-मौजूदगी को दूर किया जाए. अफ्रीका के पास संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा है, शांति अभियानों में उसका अहम रोल है, और उसने ‘एज़ुलविनी सर्वसम्मति’ (Ezulwini Consensus) और ‘सिरते घोषणा’ के जरिए लगातार मजबूत प्रतिनिधित्व की मांग की है. अफ्रीका के बिना कोई भी सुधार अधूरा रहेगा.
5. वित्तीय संस्थानों को आर्थिक वास्तविकताओं के अनुकूल बनाया जाए
पीएम मोदी का प्रस्ताव सुरक्षा परिषद सुधार को वित्तीय संस्थानों (IMF, World Bank) के सुधार से जोड़ता है. आज वैश्विक शक्ति केवल सैन्य क्षमता से तय नहीं होती. विकास वित्त, कर्ज पुनर्गठन, जलवायु फंडिंग, व्यापार नियम और तकनीक तक पहुंच भी राष्ट्रीय सुरक्षा तय करते हैं. यदि विकासशील देश वैश्विक आर्थिक वृद्धि का एक बड़ा हिस्सा चला रहे हैं, तो नियमों को तय करने में उनकी हिस्सेदारी भी उसी अनुपात में होनी चाहिए.
6. बहुपक्षीय विकास वित्तपोषण मांग-आधारित (Demand-Driven) हो
भारत का हमेशा से यह रुख रहा है कि विकास संस्थानों को एक ही फॉर्मूला सब पर थोपने के बजाय वास्तविक जरूरतों के आधार पर फंडिंग करनी चाहिए. बुनियादी ढांचे, ऊर्जा बदलाव, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी में स्थानीय जरूरतों के अनुसार वित्तपोषण मिलना चाहिए. इसका सीधा मतलब यह है कि मदद पाने वाले देशों की अपनी समाधान तैयार करने में सार्थक आवाज होनी चाहिए.
7. नई तकनीकों के नियम तय करने में विकासशील देशों की भागीदारी हो
AI, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में आज जो मानक तय होंगे, वे तय करेंगे कि डेटा पर किसका नियंत्रण होगा और डिजिटल बाजार कैसे काम करेंगे. पीएम मोदी का प्रस्ताव इस बात पर जोर देता है कि भविष्य के नियम तय करने में सबकी समान भागीदारी होनी चाहिए, ताकि ग्लोबल साउथ महज दूसरों के बनाए नियमों का पालन करने तक सीमित न रह जाए.
8. जमीनी संकटों से निपटने के लिए मजबूत तंत्र बने
सुधरे हुए वैश्विक ढांचे को ऐसे संकटों से निपटने में सक्षम होना चाहिए जो एक साथ कई क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं. युद्धों से अनाज, ईंधन, शिपिंग और खाद की आपूर्ति बाधित होती है; जलवायु आपदाएं विस्थापन लाती हैं; और साइबर हमले सुरक्षा व्यवस्था को पंगु बना सकते हैं. इसलिए यह जरूरी है कि जब विकासशील देशों पर ऐसे चौतरफा संकट आएं, तो वैश्विक संस्थाएं तेजी से और प्रभावी तरीके से मदद कर सकें.
9. समुद्री व्यापार और नाविकों (Seafarers) की सुरक्षा
पीएम मोदी ने संकट के समय नाविकों की सुरक्षा के लिए एक ब्रिक्स आपातकालीन सहायता नेटवर्क (Seafarers’ Emergency Support Network) बनाने का भी प्रस्ताव रखा. नाविक वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा हैं, लेकिन समुद्री संघर्षों, नाकेबंदी और हमलों के चलते वे भारी जोखिम में आ जाते हैं. यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में निर्बाध आवागमन और वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को मानवीय नजरिए से जोड़ता है.
10. ब्रिक्स की सहमति को ठोस परिणामों में बदला जाए
अंतिम बिंदु अमल (Implementation) का है. ब्रिक्स अक्सर बड़े-बड़े घोषणापत्र जारी करता है, लेकिन पीएम मोदी का जोर इस बात पर है कि इस एकता को ठोस नतीजों में बदला जाए. इसका मतलब है स्पष्ट प्रस्ताव, तय समय-सीमाएं, संस्थागत तंत्र और अगले शिखर सम्मेलन तक की प्रगति की निरंतर निगरानी.
सुधरी हुई सुरक्षा परिषद के लिए भारत का दावा
भारत का दावा उसकी वैधता, योगदान, क्षमता और जनसांख्यिकी पर आधारित है. दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, एक प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में सबसे बड़ा योगदानकर्ता और ग्लोबल साउथ की प्रमुख आवाज होने के नाते भारत का स्थायी सदस्यता से बाहर रहना पूरी प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है.
भारत अपनी इस मुहिम को अकेले चलाने के बजाय जी-4 (ब्राजील, जर्मनी, जापान के साथ) और ब्रिक्स जैसे मंचों के साथ जोड़कर एक साझा वैश्विक मांग के रूप में आगे बढ़ाता है.
यूएनएससी सुधारों के रास्ते में मुख्य अड़चनें
तर्क मजबूत होने के बावजूद, इसके रास्ते की राजनीति बेहद जटिल है:
- P5 (मौजूदा 5 स्थायी सदस्यों) की अनिच्छा: मौजूदा स्थायी सदस्य सैद्धांतिक रूप से सुधार का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन अपने प्रभाव को कम करने वाले किसी भी बदलाव का विरोध करते हैं.
- क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: दावेदार देशों को अक्सर अपने ही क्षेत्र के प्रतिद्वंद्वियों के विरोध का सामना करना पड़ता है (जैसे भारत के खिलाफ कॉफी क्लब/UfC की आपत्तियां).
- वीटो का विवाद: नए सदस्यों को वीटो देना मौजूदा सदस्यों को मंजूर नहीं, और बिना वीटो के स्थायी सदस्यता देना समानता के सिद्धांत के खिलाफ लगता है.
- प्रक्रियात्मक देरी: अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) का बिना किसी आधिकारिक पाठ (Text-based Negotiations) के दशकों तक खिंचते चले जाना.
यूपीएससी (UPSC) उम्मीदवारों के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
जीएस पेपर 2 (GS Paper 2) की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि यूएनएससी सुधार केवल भारत के लिए एक सीट की मांग नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की निष्पक्षता और प्रभावशीलता से जुड़ा बड़ा विषय है.
मुख्य समस्या: 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद (5 स्थायी + 10 अस्थायी) आज भी 1945 की शक्ति संरचना पर टिकी है.
उत्तर का ढांचा: 1945 के ढांचे और आज की वास्तविकता के अंतर से शुरुआत करें; अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कम प्रतिनिधित्व को रेखांकित करें; जी-4 और भारत के मजबूत दावों का उल्लेख करें; वीटो और पी-5 के अवरोधों पर चर्चा करें; और अंत में तय समय-सीमा वाले व्यापक सुधारों के साथ निष्कर्ष दें.
करंट अफेयर्स से जुड़ाव: पीएम मोदी के ब्रिक्स प्रस्ताव के तीन स्तंभों—प्रतिनिधित्व, सक्रियता और नियम निर्माण—को अपने उत्तर में जरूर शामिल करें.
और आखिर में निचोड़
पीएम मोदी के ब्रिक्स प्रस्ताव को वैश्विक शासन व्यवस्था के ‘ऑपरेटिंग सिस्टम’ को अपडेट करने की मांग के रूप में देखा जाना चाहिए. सुरक्षा परिषद में सुधार इस मांग का सबसे प्रमुख हिस्सा जरूर है, लेकिन इसके दायरे में वित्त, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा और विकासशील देशों के अधिकार भी शामिल हैं.
यह प्रस्ताव इस बात की सीधी परीक्षा है कि क्या बहुपक्षवाद उस दुनिया में प्रासंगिक और प्रभावी बना रह सकता है, जहां शक्ति, आबादी, जोखिम और उम्मीदें अब 1945 जैसी बिल्कुल नहीं रही हैं.
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