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300 बिलियन डॉलर कौन देगा? अमेरिका-ईरान डील के छठे पॉइंट पर फंसा पेंच

US Iran Deal: अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 सूत्रीय समझौते में 300 अरब डॉलर सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन गई है. जानिए छठी शर्त क्या कहती है, पैसा कहां से आएगा और क्यों उठ रहे हैं बड़े सवाल.

US Iran Deal

US Iran Deal: मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच गुरुवार (17 जून) देर रात एक सुखद खबर सामने आई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने फ्रांस में 14 शर्तों वाले MOU पर साइन किया. अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि पिछले चार महीनों से चली आ रही जंग पर स्थायी रोक लग गई है. इस समझौते के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान (Masoud Pezeshkian) ने 14 शर्तों वाले MOU पर साइन किया है (US Iran Deal). हालांकि, इन 14 बिंदुओं (US Iran Deal 14 Conditions) वाले समझौते में से छठे बिंदु पर सारे सवाल केंद्रित हो गए हैं.

अमेरिका-ईरान डील की 14 बड़ी शर्तों में से अगर छठी शर्त देखें, तो उसमें लिखा है कि अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगी ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए एक व्यापक योजना तैयार करेंगे. इसके लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की फंडिंग उपलब्ध कराने का वादा किया गया है. इसके बाद से यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपने खजाने से 300 अरब डॉलर ईरान को देगा, या फिर यही रकम अमेरिका-ईरान डील में रोड़ा बनेगी.

300 अरब डॉलर की डील पर सबसे बड़ा सवाल

अमेरिका-ईरान समझौते की चर्चा के बीच सबसे ज्यादा सवाल 300 अरब डॉलर की रकम को लेकर उठ रहे हैं (Who will give Iran $300 Billion). भारतीय मुद्रा में यह राशि करीब 28 लाख 29 हजार करोड़ रुपये के बराबर है, जो बेहद बड़ी रकम मानी जाती है. दिलचस्प बात यह है कि ईरान की मौजूदा अर्थव्यवस्था (GDP) भी लगभग 300 अरब डॉलर के आसपास है. यानी जिस रकम का जिक्र डील में हो रहा है, वह ईरान की एक साल की पूरी आर्थिक उत्पादन क्षमता के बराबर है.

अगर इस राशि को ईरान की करीब 9 करोड़ आबादी के हिसाब से बांटा जाए, तो प्रति व्यक्ति हिस्से में लगभग 34 लाख रुपये आते हैं. यह आंकड़ा देश की औसत सालाना आय से काफी अधिक है. यही वजह है कि इस प्रस्ताव को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कैसे होगा और इसे उपलब्ध कौन कराएगा.

समझौते का छठा बिंदु क्या कहता है?

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि ईरान के लिए प्रस्तावित धनराशि अमेरिकी सरकारी खजाने से नहीं आएगी. ऐसे में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजशकियान की ओर से जारी समझौता दस्तावेज का छठा बिंदु काफी अहम माना जा रहा है.

इस बिंदु के अनुसार, अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की निवेश योजना तैयार करेगा. इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका सीधे ईरान को नकद राशि देगा. योजना का उद्देश्य विभिन्न सहयोगी देशों और निजी निवेशकों की भागीदारी से पूंजी जुटाना है, जिसे ईरान में बुनियादी ढांचे, उद्योग और विकास परियोजनाओं पर खर्च किया जा सके. सरल शब्दों में कहें तो अमेरिका इस पूरी प्रक्रिया का समन्वयक बनेगा, जबकि निवेश का बड़ा हिस्सा उसके सहयोगी देशों और कंपनियों से आने की उम्मीद होगी.

पैसा कहां से आएगा?

समझौते में “रीजनल पार्टनर्स” यानी क्षेत्रीय सहयोगियों का जिक्र किया गया है. माना जा रहा है कि इसमें खाड़ी के बड़े देश, जैसे सऊदी अरब और यूएई, अहम भूमिका निभा सकते हैं. इनके सरकारी फंड और निजी कंपनियां ईरान में विकास परियोजनाओं में निवेश कर सकती हैं.

यह निवेश सड़कों, पुलों, अस्पतालों, स्कूलों, ऊर्जा परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण पर खर्च किया जा सकता है, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है. दूसरे शब्दों में, अमेरिका सीधे ईरान को पैसा देने के बजाय निवेश जुटाने की कोशिश करेगा. यानी अमेरिकी नागरिकों के टैक्स का पैसा सीधे ईरान नहीं जाएगा, लेकिन वॉशिंगटन की पहल पर सहयोगी देशों और उनकी कंपनियों का निवेश ईरान तक पहुंच सकता है.


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युद्ध की नौबत क्यों आई?

अगर आखिरकार बातचीत और समझौते के जरिए ही रास्ता निकलना था, तो फिर युद्ध की नौबत क्यों आई? जब अंत में प्रतिबंधों में राहत, निवेश की मंजूरी और पुनर्निर्माण की पहल पर सहमति बननी ही थी, तो इतने बड़े सैन्य टकराव, जान-माल के नुकसान और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता की कीमत क्यों चुकानी पड़ी?

यही वह सवाल है जो आज भी दुनिया के सामने खड़ा है. फिलहाल इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि युद्ध के बाद भी अंततः समाधान बातचीत की मेज पर ही तलाशना पड़ता है.

-भारत एक्सप्रेस



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