“अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक है, लेकिन दोस्त होना घातक है” ये कहावत अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कही थी. इसका अर्थ है कि अमेरिका के साथ दोस्ती किसी के लिए भी बहुत महंगी पड़ती है, क्योंकि फिर उसे अमेरिकी हितों को अपने हितों से ऊपर रखना पड़ता है. यह बात एक बार फिर तब सच साबित हुई जब चीन को काउंटर करने के लिए दूसरी बार सत्ता संभाल रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ नीति लाने की बात कही और उसे चीन की जगह भारत जैसे मित्र देशों के ऊपर लाद दिया.
यह पहली बार नहीं है कि अमेरिका भारत के खिलाफ ऐसा किया है. इससे पहले अमेरिका ने भारत के खिलाफ जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश के शासनकाल में भी ऐसी ही नीति अपनाई थी.
व्यापार में भारतीय बढ़त को काउंटर करने के लिए तत्कालीन बुश सरकार ने एक कानूनी प्रावधान का इस्तेमाल किया था, जिसकी मदद से ‘सुपर 301’ का गठन किया गया. इन प्रावधानों की मदद से विदेशी आयात पर टैरिफ लगाया जा सकता था.
जापान को टारगेट करने के लिए लाया था 301
दरअसल अमेरिका ने इसे जापान को टारगेट करने के लिए लाया था, लेकिन अमेरिका ने इसका प्राइमरी टारगेट भारत को बना दिया. उस समय जापान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और उसकी प्रतिद्वंदिता सीधे-सीधे अमेरिका से थी.
अब इसे अगर हम आज के नजरिये से देखें तो ऐसा लगता है कि डोनाल्ड ट्रंप ने इसे चीन को काउंटर करने के लिए लाने की बात कही थी, लेकिन वो चीन के बजाय इसे भारत पर लाद दिये. जबकि चीन ने अमेरिका से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का दबदबा छीन लिया है.
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चीन-अमेरिका की जंग में फंस गया भारत
चीन-अमेरिका टैरिफ जंग को लेकर मीडिया में बातें कम हो गई हैं, लेकिन भारत इस मामले के बीच फंस गया है. ट्रंप का कहना है कि उन्होंने भारत पर टैरिफ इसलिए लगाया क्योंकि वो रूस से तेल खरीदता है. जबकि भारत से ज्यादा तेल चीन और तुर्की खरीद रहे हैं.
ट्रंप ने 11 अगस्त को चीन पर लगने वाले टैरिफ को और 90 दिनों के लिए बढ़ा दिया है. वहीं भारत पर 27 अगस्त से एक्स्ट्रा 25% टैरिफ थोपने का प्लान है. जिसके बाद भारत पर कुल 50% टैरिफ लग जाएगा.
अमेरिका का दोहरा मानदंड चर्चा में है
अमेरिका के इस दोहरे मानदंडों का अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया में चर्चाएं हो रही हैं. अमेरिका के इस दोहरे रवैया का बचाव करते हुए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि, रूसी तेल के खरीद को लेकर चीन पर सेकेंडरी टैरिफ लगाने से विश्व में ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया है.
क्या है सुपर 301?
यह बात 80 के दशक की है. जब दुनिया में अमेरिका और जापान के बीच व्यापारिक प्रतिद्वंद अपने चरम पर था. अमेरिका के बाद जापान दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश था. हालांकि जापान और अमेरिका के बीच गहरा सहयोग था, लेकिन व्यापारिक मसले पर विशेष रूप से टेक्नोलॉजी और व्यापार मामले में भयंकर मतभेद चल रहा था. अमेरिका को जापान के व्यापार सरप्लस से दिक्कत थी.
उस समय अमेरिकी अखबारों में ‘आज अमेरिका का जापानीकरण’ और ‘जापान हमारे पैसे से अमेरिका को खरीद रहा’ जैसी सुर्खियां लगती थीं. जो यह बताने के लिए काफी है कि उस समय जापान और अमेरिका के बीच किस तरह के मतभेद थे.
अनुचित व्यापार प्रथा वाले देशों को पहचानना था मकसद
जिसके बाद अमेरिका ने 1974 के अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 में बदलाव किया. जिसका मकसद था उन देशों की पहचान करना जो ‘अनुचित व्यापार प्रथा’ वाले थे और जो अमेरिकी निर्यात में बाधा के रूप में काम करते थे. उन देशों पर व्यापारिक रूप से प्रतिबंध लगाना था.
इसी अमेरिकी व्यापार अधिनियम की धारा 301 से जन्म हुआ सुपर 301 का. जिसका मकसद जापान को टारगेट करना था.
1989 में पहली सुपर 301 लिस्ट हुई जारी
अमेरिका की संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि ने मई 1989 में अपनी पहली सुपर 301 लिस्ट जारी की. जिसमें जापान के साथ-साथ भारत और ब्राजील का भी नाम था. इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत का व्यापार सरप्लस उस समय सिर्फ 690 मिलियन डॉलर था. जबकि जापान का सरप्लस अरबों डॉलर था, लेकिन फिर भी भारत को जापान के साथ जोड़ा गया.
भारत में यह बोफोर्स घोटाला के बाद का दौर था. राजीव गांधी की सरकार चली गई थी और उनकी जगह वीपी सिंह भारत की कमान संभाल रहे थे. जनता दल के अध्यक्ष वीपी सिंह ने तब कहा था,”हमें अमेरिका को यह साफ कर देना चाहिये कि हमें अपनी राष्ट्रिय प्राथमिकताओं के खिलाफ जाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.”
इसके बाद वीपी सिंह ने अमेरिका के खिलाफ कड़ा रूख अपनाया.
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अमेरिका की ये थी मुख्य मांगें
अमेरिका की मांग थी कि अमेरिकी बीमा कंपनियों, फिल्मों और होम वीडियो को भारत के बाजार में आसानी से पहुंच मिले. इसके अलावा अमेरिका चाहता था कि विदेशी कंपनियों को भारत में अपने उद्यमों में 50% से ज्यादा इक्विटी की इजाजत दी जाए. यानी विदेशी कंपनियों के द्वारा भारत में लगाये गए उद्यम पर पूरी तरह नियंत्रण विदेशी कंपनियों का हो ना की सरकार का. इसके अलावा अमेरिका चाहता था कि भारत सरकार पेटेंट व कॉपीराइट कानून को और सख्त करे.
भारत के साथ ऐसे खेला अमेरिका ने खेल
अमेरिका ने 1990 में ब्राजील और जापान के साथ हुई वार्ता के बाद उनका नाम इस लिस्ट से हटा दिया, लेकिन भारत का नाम शामिल रखा. भारत को बुश सरकार ने दो महीने में कार्रवाई की धमकी दी, हालांकि यह कार्रवाई कभी नहीं हुई. उसके बाद 1991 में पीवी नरसिम्हा राव ने भारत की अर्थव्यवस्था को दुनिया के लिए खोल दिया. जिसकी वजह से भारत उस समय अमेरिकी टैरिफ मार से बच गया.
अब ट्रंप के शासनकाल में एक बार फिर भारत पर व्यापारिक कार्रवाई की तलवार लटक रही है. उन्होंने शुरुआत में इसको चीन को काउंटर करने के लिए लाया था, लेकिन चीन इससे बच निकला और भारत अभी भी फंसा हुआ है.
– भारत एक्सप्रेस
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