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‘हम अच्छे पड़ोसी बनेंगे, मतभेद सुलझाएंगे!’ 7 साल बाद शी जिनपिंग की भारत में एंट्री, क्या बदल गए ड्रैगन के सुर?

BRICS Summit 2026 के बीच शी जिनपिंग करीब 7 साल बाद भारत आ रहे हैं, जहां पीएम मोदी के साथ अहम द्विपक्षीय बैठक होगी.

Xi Jinping

नई दिल्ली में पीएम मोदी और शी जिनपिंग की आमने-सामने मुलाकात का प्रतीकात्मक दृश्य

Xi Jinping India Visit 2026: भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित हो रहे ब्रिक्स (BRICS Summit 2026) शिखर सम्मेलन के बीच एक ऐतिहासिक कूटनीतिक मोड़ देखने को मिला है. लगभग 7 सालों के लंबे अंतराल के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत की धरती पर कदम रख रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली हाई-प्रोफाइल द्विपक्षीय (Bilateral) मुलाकात से ठीक पहले बीजिंग का एक बेहद अहम और चौंकाने वाला संदेश सामने आया है.

चीन ने कहा है कि वह भारत के साथ एक ‘अच्छे पड़ोसी’ की तरह रहना चाहता है और दोनों देश एक-दूसरे की सफलता के साझेदार बनने के लिए तैयार हैं.

“मतभेदों को सही ढंग से सुलझाएंगे”

भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए इस बात की पुष्टि की कि पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. उन्होंने लिखा कि कजान (रूस) और तियानजिन (चीन) में हुई पिछली मुलाकातों के बाद यह लगातार तीसरा साल है जब दोनों वैश्विक दिग्गज एक-दूसरे से आमने-सामने मिल रहे हैं.

चीनी राजदूत ने बीजिंग की प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि दोनों देश आपसी संचार (Communication) बढ़ाएंगे, सहयोग मजबूत करेंगे और सीमा से जुड़े मतभेदों को उचित तरीके से संभालेंगे.

 

क्यों अहम माना जा रहा है शी जिनपिंग का यह दौरा?(Xi Jinping India Visit)

साल 2020 में गलवान घाटी में हुए हिंसक सैन्य टकराव के बाद से भारत और चीन के संबंधों में भारी कड़वाहट आ गई थी. ऐसे में शी जिनपिंग का 7 साल बाद भारत आना केवल एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि दोनों देशों के रिश्तों को दोबारा पटरी पर लाने की एक बड़ी कूटनीतिक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.

चीन की ओर से आया यह बयान संकेत देता है कि भले ही सीमा और रणनीतिक मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गंभीर मतभेद बने हुए हैं, लेकिन बीजिंग नहीं चाहता कि इन मतभेदों का साया दोनों देशों के संपूर्ण व्यापारिक और राजनयिक रिश्तों पर पड़े.

ड्रैगन के बदले सुर के पीछे की बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह ‘नरम रुख’ अचानक नहीं आया है. वैश्विक अर्थव्यवस्था में जारी मंदी, अमेरिकी टैरिफ का बढ़ता दबाव और भारत की तेजी से बढ़ती आर्थिक ताकत ने चीन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भारत को नजरअंदाज करके एशिया में स्थिरता नहीं लाई जा सकती.

चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा गया है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी विकास यात्राओं में एक-दूसरे के मददगार बनेंगे. यानी चीन अब भारत को केवल एक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने के बजाय एक बड़े बाजार और सहयोगी के रूप में भी साधने की कोशिश कर रहा है.

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क्या वाकई बदलेगी रिश्तों की तस्वीर?

चीनी कूटनीति का इतिहास गवाह रहा है कि मीठे बयानों के बावजूद जमीन पर उनका रवैया अक्सर अलग होता है. ऐसे में भारत का रुख बिल्कुल साफ है-चीन के साथ रिश्ते तभी सामान्य हो सकते हैं जब सीमा पर पूर्ण शांति और विश्वास बहाली हो. पीएम मोदी और शी जिनपिंग की बातचीत के दौरान भारत की प्राथमिकता यही रहेगी कि कथनी और करनी के अंतर को मिटाया जाए.

अब देखना यह होगा कि शनिवार को होने वाली इस ऐतिहासिक बैठक के बाद सीमा पर जमी बर्फ पिघलती है या फिर यह बातचीत केवल कागजी वादों तक ही सिमट कर रह जाती है.

-भारत एक्सप्रेस

 



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